ब्लैक फंगस के इंजेक्शन की कागजी कार्यवाही में उलझे मरीजों के परिजन
भोपाल
कोरोना महामारी के बीच प्रदेशभर में ब्लैकफंगस इंफेक्शन के मरीज बढ़ते जा रहे हैं। फंगल इंफेक्शन के इलाज में इस्तेमाल होने वाला एम्फोटेरेसिन-बी इंजेक्शन का संकट प्रदेश के मरीजों की तकलीफ बढ़ा रहा है। प्राइवेट अस्पतालों में इलाज करा रहे मरीजों के लिए यह इंजेक्शन मेडिकल कॉलेजों के डीन के सिग्नेचर के बाद ही मिल पा रहे हैं। राजधानी भोपाल में दो दिनों से लगातार हो रहे हंगामे के बाद जीएमसी के डीन ने सुबह 10 बजे से दोपहर 12 बजे तक फॉर्म जमा करने की व्यवस्था शुरू की है। लेकिन फिर भी व्यवस्था नहीं बन पा रही है। शुक्रवार को 12 बजे तक फॉर्म जमा करने वाली खिडकी ही नहीं खोली गई। आलम यह है कि मरीजों के परिजन सुबह चार बजे से ही फार्म जमा करने के काउंटर पर पहुंच रहे हैं। फार्म जमा करने पहुंचे मरीज के परिजन रवि ने बताया कि उसका भाई एक निजी अस्पताल में भर्ती है। डॉक्टरों ने उसे रोजाना छह इंजेक्शन लाने को कहा है। हफ्ते भर में सिर्फ 4 इंजेक्शन ही मिल पाए हैं।
गांधी मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों की मानें तो पूरे प्रदेश भर के निजी अस्पतालों में भर्ती मरीजों के लिए ये मौखिक निर्देश दिए गए हैं कि डॉक्टर के पर्चे के साथ मरीज के तमाम डॉक्यूमेंट्स पर स्थानीय सरकारी मेडिकल कॉलेज के डीन तभी दस्तखत करेंगे जब संभागायुक्त की ओर से इंजेक्शन का लॉट मेडिकल कॉलेज या दवा बाजार में पहुंचने की जानकारी मिलेगी। इसके बाद ही डीन को साइन करने के लिए कहा जाएगा।
