करोड़ों के भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे आरजीपीवी के मुखिया

 भोपाल
 प्रदेश के एक मात्र राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विवि (आरजीपीवी) की साख को मुखिया ही बट्टा लगाते नजर आ रहे हैं। आरजीपीवी की कमान कुलपति और रजिस्ट्रार के हाथ में हैं, लेकिन वे शिक्षा के मंदिर मंे ही जमकर भ्रष्टाचार कर रहे हैं। दोनों पर भ्रष्टाचार को लेकर राजपाल, मंत्री से लेकर पीएस तक को लिखित में शिकायत की गई है।

शिकायत में भ्रष्टाचार का सूत्रधार कुलपति डॉ. सुनील कुमार गुप्ता और कुलसचिव डॉ. आरएस राजपूत को बनाया गया है। हैं। दोेनों पर आर्थिक अनियमितताओं के साथ-साथ सामग्री क्रय व अन्य प्रशासकीय कार्यों में स्कालरशिप, पीएचडी फाइल आदि में ढेरों अनियमितततों आरोप लगाए गए हैं। ये अनियमितताएं गत कई वर्षो से कुलपति संचालक एवं रजिस्ट्रार के पदों पर रहते हुए की हैं।  

कागजों पर खरीद लिए 25 लाख के कंप्यूटर  
कुलपति ने वर्ष 2018 में आरजीपीवी के यूआईटी केंपस के लिए 30 कंप्यूटर खरीदे। इसके लिए विवि ने 25 लाख 90 हजार 500 रुपए की राशि का भुगतान भोपाल की केबी मार्केटिंग को कर दिया गया। लेकिन खरीदी गई सामग्री विवि के स्टोर सेक्शन को प्राप्त नहीं हई। खरीदी के भौतिक सत्यापन के लिए 26 सितंबर 2020 को एक कमेटी भी गठित की गई थी, लेकिन कमेटी की रिपोर्ट में भी यह साबित हो गया कि खरीदे गए कंप्यूटर स्टोर रूम में नहीं प्राप्त हुए।

इंटीग्रेटेड इंटीग्रेटेड यूनिवर्सिटी मैनेजमेंट सिस्टम के बहाने करोड़ों का घोटाला
कुलपति सुनील कुमार द्वारा अंतर विश्वविद्यालय महासंघ (इंटर यूनिवर्सिटी एसोसिएशन) स्थापित करने का प्रस्ताव राजभव को दिया गया था,  जिसकी स्थापना सम्बंधित प्रक्रिया वर्तमान में जारी है इसके अंतर्गत दिनांक 22 फरवरी को राजभवन में हुई समन्वय समिति में गठन सम्बन्धी प्रस्ताव लाया गया था। राज्यपाल को अवगत कराया गया की इसका उद्देश्य सभी विश्वविद्यालयों के उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम उपयोग करने के लिए है, लेकिन प्रस्ताव का उपयोग कुलपति ने ना केवल महामहीम से अपनी घनिष्ठता बढ़ाने किया। बल्कि अपनी व्यक्तिगत आर्थिक स्थिति अच्छी करने हेतु एक बड़ा वित्तीय घोटाले का खेल कर डाला। महासंघ अभी धरातल पर नहीं आया है, इसके पहले ही सुनील कुमार के नेतृत्व में राजीव गाँधी विश्वविद्यालय ने एक इंटीग्रेटेड यूनिवर्सिटी मैनेजमेंट सिस्टम का विकास किया जिसके अंतर्गत लगभग 12 से 15 कर्मचारी बिना किसी विज्ञापन एवं नियुक्ति प्रक्रिया के रख लिए गए। जिन्हें बीते दो वर्षों से लगभग एक करोड़ रुपए सेलरी के नाम पर बांट दिए।

छात्रावास में कैंटीन के नाम पर करोड़ों की बंदरबांट
शिकायतकर्ता प्रदीप सैनी ने कुलसचिव पर सारे नियम दरकिनार कर छात्रावासों में केंटीन का काम अपने परिचितों को देने का अरोप लगाया है। रजिस्ट्रार डाॅ. सुनील कुमार गुप्ता ने अधिकृत दरें प्राप्त किए बिना ही टेंडर अपने परिचितों की झोली में डाल दिया। छात्रावास में भोजन प्रबंधन के लिए वर्ष 2017-18 में मेसर्स दक्ष इन्नोवेटिव को 2 हजार रुपए प्रतिमाह की दर पर कार्य का आदेश दिया था जो सबसे न्यनूतम था। लेकिन नियमों को दरकिनार कर यह कार्य 2200 रुपए की दर से वीआईपी सर्विसेज को बिना किसी निविदा आमंत्रित किए दे दिया गया। वर्कआॅर्डर के लिए कोई अधिकृत व लिखित में अनुबंध भी नहीं किया गया।

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