कन्नौज का वैभव सामने लाने वाले ही पर्दे में, छह साल से ढकी हैं सम्राट हर्षवर्धन और चीनी दार्शनिक ह्वेन त्सांग की मूर्तियां
कन्नौज
इतिहास के पन्ने कन्नौज के ऐतिहासिक और गौरवशाली वैभव से भरे पड़े हैं, लेकिन कन्नौज में ही ह्वेनत्सांग परदे में ढके हैं। इसी चीनी यात्री ने दुनिया को सबसे पहले कन्नौज और उसके विशाल साम्राज्य से परिचित कराया था। वही नहीं सम्राट हर्षवर्द्धन भी परदे से बाहर नहीं आ पा रहे हैं। छह साल से कन्नौज के समृद्ध संग्रहालय के द्वार पर दोनों की प्रतिमाएं बंधी रखी हैं। इस संग्रहालय को उद्घाटन की प्रतीक्षा है।
छह साल से हो रहा इंतजार
कन्नौज की ऐतिहासिक धरोहरों को समेटने के लिए यहां एक खूबसूरत म्यूजियम बनाया गया है। यह छह साल पहले बन कर तैयार हो गया था। तभी से बाहरी हिस्से में ह्वेनत्सांग और सम्राट हर्षवर्द्धन की आदमकद मूर्तियां लगी हैं। नीचे दोनों का संक्षिप्त जीवन परिचय लिखा है। अब तक म्यूजियम की औपचारिक शुरुआत नहीं हो सकी है, इसलिए दोनों की मूर्तियों पर पर्दा पड़ा है।
ईसा पूर्व से लेकर अलग-अलग कालखंड की विरासत
कन्नौज में समय-समय पर खुदाई में मिलने वाली यहां की धरोहरों को म्यूजियम में सहेजा गया है। इसमें गुप्तकाल के बर्तनों के अवशेष यह बताते हैं कि कन्नौज में मानव सभ्यता का इतिहास पुराना है। करीब 2000 साल पहले के कुषाण काल से लेकर उसके बाद के अलग-अलग कालखंड से जुड़ी अनमोल विरासत यहां सहेजी गई हैं।
1444 साल पहले आए थे कन्नौज
प्रयागराज में महाकुंभ लगवाने वाले चक्रवर्ती सम्राट हर्षवर्द्धन (सन् 590-647) की राजधानी कन्नौज में सन् 622 में चीनी दार्शनिक व बौद्ध भिक्षु ह्वेनत्सांग (602-664) आए थे। यह विशाल साम्राज्य उन्हें इतना भाया कि वह करीब 15 साल यहीं रहे। पूरा भारत घूमे लेकिन कन्नौज में सबसे ज्यादा समय बिताया। भारत से लौटने के बाद अपनी किताब सी-यू-की में भारत यात्रा के अनुभव लिखे। सम्राट हर्षवर्द्धन के शासनकाल में यहां की सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक व सांस्कृतिक धरोहरों का जिक्र किया। उनके माध्यम से ही दुनिया को पता चला कि सम्राट हर्षवर्द्धन ने ही प्रयागराज में महाकुंभ शुरू कराया था। उनके दानी स्वभाव की प्रसिद्धि पूरे महाद्वीप में थी।
दुनिया में भारत का वैभव दिखा चुकी मूर्तियां
कन्नौज के म्यूजियम में रखीं मूर्तियां दुनिया भर में भारत के प्राचीन और समृद्ध वैभव से दुनिया को रूबरू करा चुकी हैं। बेल्जियम, जर्मनी, अमेरिका जैसे देशों में लगने वाले अंतराष्ट्रीय प्रदर्शनी में देश की नुमाइंदगी कर चुकी यह मूर्तियां सदियों पहले अलग-अलग कालखंड की हैं।
