शिवमानस पूजा पर स्वामी सदात्मानंद सरस्वती जी का व्याख्यान
भोपाल
संस्कृति विभाग के आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास द्वारा शंकर व्याख्यानमाला के 39वें पुष्प का आयोजन किया गया। आयोजन में आचार्य स्वामी सदात्मानंद सरस्वती जी ने आचार्य शंकर रचित स्त्रोत "शिव मानस पूजा" विषय पर व्याख्यान दिया।
स्वामीजी ने व्याख्यान के माध्यम से शंकराचार्य जी के समग्र दर्शन का उदाहरण देते हुए बताया कि एक ओर आचार्य प्रस्थानत्रयी भाष्य जैसे गूढ़ ग्रंथो की रचना करते हैं, वहीं जन-समान्य के लिए सरल स्तोत्रों कि भी रचना करते हैं। शिव मानस पूजा भी उन्हीं स्तोत्रों में आचार्य शंकर की महत्वपूर्ण रचना है, जिसका अर्थ है शिव की मन से की गयी पूजा।
हम मूर्तिपूजक नहीं, ईश्वरपूजक हैं
पूजन के कई प्रकार जैसे पंचोपचार, षोडशोपचार एवं अकिंचन भाव से की गई मानसिक पूजा की महत्ता पर भी प्रकाश डाला। स्वामी जी ने बताया कि पूजा का अर्थ जैसे हम अपने अतिथि के आने पर उसका सत्कार करते है, उसी प्रकार पूजा का अर्थ ईश्वर के प्रति अपनी कृतज्ञता, भक्ति, प्रेम को अभिव्यक्त करना है। यह एक भ्रांति है कि हम मूर्ती पूजा करते है, हम मूर्ति पूजक समाज नहीं हम मूर्ति में ईश्वर का आधान कर ईश्वर कि उपासना करते है, जिस प्रकार हम दूरभाष पर किसी व्यक्ति से बात करते है तब हम उस फोन से नहीं पर उस व्यक्ति से वार्ता कर रहे होते है। मानसी पूजा के महत्व का वर्णन करते हुए स्वामी जी ने बताया कि कैसे उपासना के माध्यम से उपास्य के गुणों का आधान उपासक के जीवन में हो जाता है और उन गुणों का प्रभाव उसके जीवन, व्यवहार, विचार, क्रिया में परिलक्षित भी होता है। भक्ति की सार्थकता "मैं अपने हर कार्य द्वारा अपने ईश्वर की ही आराधना कर रहा हूँ" इस भाव के साथ ब्रह्म से एकत्व की अनुभूति में है।
व्याख्यान का सीधा प्रसारण न्यास के फेसबुक और यूट्यूब चैनल पर किया गया। इसमें चिन्मय मिशन, आर्ष विद्या मंदिर राजकोट, आदि शंकर ब्रह्म विद्या प्रतिष्ठान उत्तरकाशी, मानव प्रबोधन प्रन्यास बीकानेर, हिन्दू धर्म आचार्य सभा, मनन आश्रम भरूच आदि संस्थाएँ भी सहयोगी रहीं। न्यास द्वारा प्रतिमाह शंकर व्याख्यानमाला के अंतर्गत वेदान्त विषयक व्याख्यान आयोजन किया जाता है।
वक्ता – स्वामी सदात्मानंद सरस्वती
स्वामीजी का जन्म 1962 में गुजरात में हुआ। अभियांत्रिकी में अपनी शिक्षा पूर्ण करने के बाद आपने 1986 में तीन वर्षीय वेदान्त पाठ्यक्रम में अध्ययन किया। आपने वर्ष 1989 में ब्रह्मचर्य दीक्षा तथा वर्ष 1997 में पूज्य स्वामी दयानन्द सरस्वती से संन्यास दीक्षा ग्रहण की।
वर्ष 1994 से 2014 तक आर्ष विद्या केंद्र, बंगलुरु में आचार्य रहे। आपने कैलाश आश्रम, ऋषिकेश में भी अतिथि आचार्य के रूप में उपनिषदों तथा अन्य वेदान्त ग्रन्थों का भाष्य व टीका के साथ अध्यापन किया। आप वर्ष 2014 से 2017 तक आर्ष विद्या गुरुकुलम्, अनईकट्टी, कोयम्बटूर में तीन वर्षीय वेदान्त पाठ्यक्रम के प्रमुख आचार्य रहे।
आपके द्वारा नियमित रूप से प्रकरण ग्रन्थ, उपनिषद् भाष्य, भगवद्गीता, ब्रह्मसूत्र और संस्कृत पर विविध पाठ्यक्रमों, शिविरों, कक्षाओं एवं व्याख्यानों के आयोजन किए जाते हैं। वर्तमान में आप आर्ष विद्या गुरुकुलम्, अनईकट्टी, कोयम्बटूर में प्रमुख आचार्य हैं और दो वर्षीय आवासीय वेदान्त पाठ्यक्रम का अध्यापन कर रहे हैं।
