मोदी कैबिनेट ने आधार से वोटर कार्ड को जोड़ने के प्रस्ताव को दे दी है मंजूरी

नई दिल्ली
केंद्र सरकार ने चुनाव सुधार की तरफ व्यापक दिशा में कदम बढ़ाते हुए वोटर आईडी कार्ड से आधार को लिंक करने वाले मसौदा विधेयक को मंजूरी दे दी है। हालांकि, विधेयक में यह भी साफ किया गया है कि दोनों कार्ड को लिंक करना अनिवार्य नहीं बल्कि स्वैछिक होगा। आइए जानते हैं केंद्र के इस कदम के बाद क्या-क्या बदलेगा..

    मसौदा विधेयक में क्या है?
    पीएम नरेंद्र मोदी कैबिनेट ने इस प्रस्तावित विधेयक में वोटर कार्ड को आधार से जोड़ने की मंजूरी दी है। चुनाव आयोग काफी लंबे समय से इस सुधार की मांग कर रहा था। इस विधेयक के तहत जनप्रतिनिधित्व कानून में बदलाव किया जाएगा।

    मसौदा विधेयक पर अब आगे क्या होगा?
    केंद्र सरकार इसे शीतकालीन सत्र में इसे संसद में पेश करेगी। संसद में इसपर बहस हो सकती है और सदस्य कुछ बदलाव आदि के बारे में सरकार को राय दे सकते हैं। संसद से पास होने के बाद ही आगे यह कानूनी रूप अख्तियार कर सकता है।

    क्या यह प्रस्ताव अनिवार्य होगा?
    नहीं। सरकार ने मसौदा प्रस्ताव में इसे ऐच्छिक (Voluntary) कहा है। यानी अगर कोई शख्स अपने वोटर कार्ड को आधार से जोड़ना चाहे तो वह ऐसा कर सकता है। लेकिन यह अनिवार्य नहीं होगा।
 
   वोटर और आधार कार्ड लिंक से क्या होगा फायदा?
    चुनाव आयोग के अनुसार, आधार से वोटर कार्ड लिंक हो जाने के कारण वोटिंग में फर्जीवाड़ा रुक सकता है। इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग की दिशा में भी यह अहम कदम होगा। अगर यह लागू होता है तो प्रवासी वोटर जहां से उनका वोटर कार्ड होगा वहां वोट डाल पाएंगे।
 
   वोटर कार्ड के आधार से लिंक पर और क्या मिलेगा लाभ?
    उदाहरण के तौर पर किसी शख्स का उसके गांव के वोटर लिस्ट में नाम है और वह लंबे समय से शहर में रह रहा है। वह शख्स शहर के वोटर लिस्ट में भी अपना नाम अंकित करवा लेता है। फिलहाल दोनों जगहों पर उस शख्स का नाम वोटर लिस्ट में अंकित रहता है। लेकिन आधार से लिंक होते ही केवल एक वोटर का नाम एक ही जगह वोटर लिस्ट में हो सकेगा। यानी एक शख्स केवल एक जगह ही अपना वोट दे पाएगा।

    वोटर आईडी कार्ड और आधार को जोड़ने की शुरुआत कब हुई थी?
    फरवरी 2015 में भारतीय निर्वाचन आयोग ने वोटर पहचान पत्र (EPIC) को आधार से जोड़ने की शुरुआत कर दी थी। तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एस एस ब्रह्मा ने इसे शुरू किया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने उसी साल अगस्त में पीडीएस, एलपीजी और केरोसिन के वितरण में आधार के इस्तेमाल पर रोक लगान के कारण बाद में इस कार्रवाई को निर्वाचन आयोग ने स्थगित कर दिया था। इस दौरान करीब 38 करोड़ वोटर कार्ड को आधार से लिंक भी कर लिया गया था।
 
   चुनाव आयोग ने केंद्र से क्या मांग की थी?
    2019 के अगस्त महीने में चुनाव आयोगी की तरफ से कानून मंत्रालय के सचिव को एक चिट्ठी लिखी गई थी। इस चिट्ठी में जनप्रतिनिधित्व कानून 1950 और आधार अधिनियम में संशोधन के लिए प्रस्ताव की बात लिखी गई थी। आयोग का तर्क था कि इससे वोटर लिस्ट में गड़बड़ियों से बचा जा सकता है। आयोग ने पत्र में लिखा था कि आधार को जोड़ने के कारण वोटर कार्ड के फर्जीवाड़े से बचा जा सकता है और फर्जी वोटरों की समस्या से निजात मिल सकती है।
 
   मसौदा विधेयक में क्या-क्या बदलाव हैं?
    वोटर कार्ड से आधार लिंक के अलावा वोटर अब साल में 4 तारीखों, 1 जनवरी, 1 अप्रैल, 1 जुलाई और 1 अक्टूबर को अपना नाम मतादाता सूची से जुड़वा सकता है। इससे पहले केवल 1 जनवरी को ही ऐसा होता था। मौजूदा व्यवस्था में प्रत्येक साल की एक जनवरी तक 18 वर्ष की आयु प्राप्त करने वालों को मतदाता बनने का अधिकार मिल जाता है।

   लैंगिक भेदभाव खत्म करने के लिए क्या हैं प्रस्ताव?
    प्रस्तावित विधेयक में सशस्त्र बल और केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बल के कर्मियों के लिए निर्वाचन नियमों को लैंगिक आधार पर एक समान बनाने का प्रस्ताव भी शामिल है। इसके तहत आयोग ने महिला सैन्यकर्मियों के पति को भी सर्विस वोटर का दर्जा देने के लिये जनप्रतिनिधित्व कानून में बदलाव के लंबित प्रस्ताव पर अमल करने का अनुरोध किया था। मौजूदा व्यवस्था में सैन्यकर्मियों की पत्नी को सर्विस वोटर का दर्जा मिलता है लेकिन महिला सैन्यकर्मी के पति को यह दर्जा देने का कोई प्रावधान नहीं है।

इस मसौदा विधेयक में और क्या हैं प्रस्ताव?
    एक अन्य प्रस्ताव में चुनाव आयोग को किसी भी परिसर को चुनाव से जुड़े किसी भी प्रकार की जरूरत के लिए अधिग्रहण करने की शक्ति देता है। इस प्रस्ताव के तहत आयोग अब केवल पोलिंग स्टेशन या फिर बैलेट बॉक्स या ईवीएम रखने के अलावा भी परिसर का अन्य प्रकार की जरूरत के लिए इस्तेमाल कर सकता है।

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