कांग्रेस नेताओं की खून से लाल हुई ये घाटी अब भी न्याय का इंतजार

रायपुर. छत्तीसगढ़ के बस्तर के झीरम घाटी हत्याकांड को 8 बरस बीत चुके हैं. कांग्रेस नेताओं की खून से लाल हुई ये घाटी अब भी न्याय का इंतजार कर रही है, लेकिन जांच की रफ्तार ऐसी की कई चश्मदीद गवाहों का आज तक NIA ने बयान तक दर्ज नहीं किया है. 25 मई 2013 को माओवादियों के हाथों छत्तीसगढ़ कांग्रेस के शीर्ष स्तर के कई नेता मारे गए थे. ये एक ऐसी हिंसा थि जिसने पूरे देश को हिला कर रख दिया था. फिर भी जांच अब तक अधूरी है. झीरम हमले में कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, पूर्व केन्द्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल और बस्तर टाइगर कहे जाने वाले महेन्द्र कर्मा की मौत हुई थी.

इस घटना को आज 8 साल बीत चुके हैं, लेकिन पीड़ितों को न्याय नहीं मिल सका. इस मामले की जांच एनआईए द्वारा की जा रही है. साथ ही राज्य सरकार ने भी जांच के लिए एसआईटी का गठन किया है. लेकिन अब तक एजेंसियों की जांच पूरी नहीं हो पायी और न तो घटना के समय मौजूद कुछ प्रत्यक्षदर्शियों के बयान तक आज तक दर्ज नहीं किया है. घटना के चश्मदीद शिवनारायण द्विवेदी ने NIA को पत्र लिखा है कि इस घटना को 8 साल बीत चुके हैं और उनका बयान लिया जाए. मामले के एक और चश्मदीद दौलत रोहड़ा का कहना है कि झीरम घाटी कांड कोई सामान्य घटना नहीं बल्कि सुपारी किलिंग थी और पीड़ितों के परिजन आज भी न्याय का इंतजार कर रहे है.

बीजेपी पर गंभीर आरोप
इधर इस मामले में कांग्रेस का कहना है कि बीजेपी झीरम मामले की जांच नहीं होने देना चाहती. कांग्रेस संचार विभाग के प्रमुख शैलेश नितिन त्रिवेदी का कहना है कि झीरम कांड के शहीदों के परिजन केंद्रीय गृह मंत्री से मिलना चाहते थे, लेकिन उन्हें मिलने नहीं दिया गया और एनआईए केवल जांच का दिखावा करती रही. वहीं बीजेपी के प्रवक्ता संजय श्रीवास्तव यह कहते हैं कि जब झीरम कांड की जांच के लिए एनआईए का गठन किया गया तब केंद्र में यूपीए की सरकार थी और छत्तीसगढ़ कांग्रेस के नेताओं ने कहा था कि झीरम मामले में उनके पास ऐसे सबूत हैं, जिन्हें वे सरकार आने के बाद पेश करेगी, लेकिन आज सरकार को आए भी ढाई साल से ज्यादा का वक्त बीत गया है, लेकिन झीरम से जुड़े ऐसे कोई भी सबूत अब तक पेश नहीं किए गए.

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