भारत में दहेज प्रथा पर छिड़ी नई बहस

नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने भारत में दहेज प्रथा पर एक बार फिर बहस छेड़ दी है. गैर-सरकारी और सामाजिक संगठन पहले से ही जो बात कहते रहे थे अब शीर्ष अदालत ने भी वही बात कही है.भारत में महिलाओं ने शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में बहुत प्रगति की है, लेकिन शादियों में दहेज की समस्या बनी हुई है. पिछले दशकों में लगातार नए बने नए कानूनों के बावजूद इसके रोकने में कोई कामयाबी नहीं मिली है. अब सुप्रीम कोर्ट ने दहेज-निरोधक कानून पर पुनर्विचार की भी जरूरत बताई है. देश में शिक्षा के प्रचार-प्रसार और समाज के लगातार आधुनिक होने के बावजूद दहेज प्रथा पर अंकुश नहीं लगाया जा सका है. दहेज के लिए हत्या और उत्पीड़न के भी हजारों मामले सामने आते रहे हैं. लेकिन साथ ही दहेज निरोधक कानून के दुरुपयोग के मामले भी अक्सर सामने आते हैं. इससे इस कानून पर सवाल उठते रहे हैं. क्या कहा शीर्ष अदालत ने शादी-विवाह में दिए-लिए जाने वाले दहेज को लेकर एक लंबे समय से बहस होती आ रही है. दहेज को कुप्रथा बताया जाता है. इसके खिलाफ कड़े कानून भी बनाए गए हैं. लेकिन इन सबके बावजूद शादियों में दहेज के लेनदेन पर रोक नहीं लग पाई है. दहेज जैसी कुप्रथा पर रोक लगाए जाने के मकसद से अधिकारियों को जिम्मेदार बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई थी. सुप्रीम कोर्ट ने इस सप्ताह इस याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि दहेज एक सामाजिक बुराई है और इसमें कोई संदेह नहीं है. लेकिन बदलाव समाज के भीतर से आना चाहिए कि परिवार में शामिल होने वाली महिला के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है और लोग उसके प्रति कितना सम्मान दिखाते हैं. शीर्ष अदालत ने कहा कि महिलाओं की स्थिति पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है. कानून होने के बावजूद दहेज जैसी सामाजिक बुराई के कायम रहने पर सुप्रीम कोर्ट ने कानून पर फिर विचार करने की जरूरत बताई है. सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर याचिका को विधि आयोग के पास भेज दिया और कहा कि संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत उस तरह का कोई उपाय इस न्यायालय के अधिकार क्षेत्र के बाहर है, जिसमें अनिवार्य रूप से विधायी सुधारों की आवश्यकता होती है.

साबू सेबेस्टियन और अन्य की ओर से यह याचिका दायर की गई थी. न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति एएस बोपन्ना की खंडपीठ ने जनहित याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि इस मुद्दे पर मौजूदा कानून के तहत उठाए जाने वाले कदमों पर विचार करने को लेकर बातचीत शुरू की जा सकती है. अदालत की राय में अगर विधि आयोग इस मुद्दे के तमाम पहलुओं पर विचार करे तो उचित होगा. उसका कहना था कि याचिकाकर्ता इस मामले को विधि आयोग के समक्ष उठाने के लिए स्वतंत्र है. जारी है दहेज प्रथा भारत में शादी के मौकों पर लेन-देन यानी दहेज की प्रथा आदिकाल से चली आ रही है. पहले यह वधू पक्ष की सहमति से उपहार के तौर पर दिया जाता था. लेकिन हाल के वर्षों में यह एक सौदा और शादी की अनिवार्य शर्त बन गया है. विश्व बैंक ने इसी साल जुलाई में एक अध्ययन में कहा था कि बीते कुछ दशकों में भारत के गांवों में दहेज प्रथा काफ़ी हद तक स्थिर रही है. लेकिन यह जस की तस है. विश्व बैंक की अर्थशास्त्री एस अनुकृति, निशीथ प्रकाश और सुंगोह क्वोन की टीम ने 1960 से लेकर 2008 के दौरान ग्रामीण इलाके में हुई 40 हजार शादियों के अध्ययन में पाया कि 95 फीसदी शादियों में दहेज दिया गया. बावजूद इसके कि वर्ष 1961 से ही भारत में दहेज को गैर-कानूनी घोषित किया जा चुका है. यह शोध भारत के 17 राज्यों पर आधारित है. इसमें ग्रामीण भारत पर ही ध्यान केंद्रित किया गया है जहां भारत की बहुसंख्यक आबादी रहती है. दहेज में परिवार की बचत और आय का एक बड़ा हिस्सा खर्च होता है. वर्ष 2007 में ग्रामीण भारत में कुल दहेज वार्षिक घरेलू आय का 14 फीसदी था. देश में वर्ष 2008 से लेकर अब तक समाज में काफी बदलाव आए हैं. लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि दहेज के लेन-देन के तौर-तरीकों में अब तक कोई बदलाव देखने को नहीं मिला है. अध्ययन से यह बात भी सामने आई है कि दहेज प्रथा सभी प्रमुख धर्मों में प्रचलित है.

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