कृष्ण भक्ति ऐसी कि ऑस्ट्रेलिया में ही बना दिया ‘वृंदावन’, PM मोदी ने किया इस विदेशी ‘राधा’ का जिक्र
नई दिल्ली
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज (रविवार) 'मन की बात' से देश को संबोधित किया। अपने संबोधन में पीएम मोदी ने अमृत महोत्सव, आयुष्मान भारत योजना, युवाओं के सफल स्टार्टअप और विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुकी नून नदी का जिक्र किया। इसी दौरान पीएम मोदी ने मथुरा-वृंदावन की भव्यता और दिव्यता की बात करते हुए ऑस्ट्रेलिया की रहने वाली एक कृष्ण भक्त 'जगतारिणी दासी' की प्रशंसा की। आइए जानते हैं, कौन हैं 'जगतारिणी दासी'? कौन हैं ऑस्ट्रेलिया की जगतारिणी दासी? कौन हैं ऑस्ट्रेलिया की जगतारिणी दासी? हिंदू धर्म और यहां के धर्म ग्रंथों, भगवानों में शुरू से ही विदेशियों की आस्था रही है। कई ऐसे लोग भारत आए जो यहां की संस्कृति और भक्ति से इतना प्रभावित हुए कि यही को होकर रह गए। मथुरा-वृंदावन हो या बनारस सभी हिंदू धर्म स्थलों पर आपको विदेश से आए लोग भगवान की आस्था में लीन दिखाई देंगे।
वृंदावन में गुजारे 12 साल वृंदावन में गुजारे 12 साल मूल रूप से ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न की रहने वाली जगतारिणी की शुरू से ही थिएटर और कला के प्रति रुचि थी, इसलिए 21 साल की उम्र में सिडनी चली गईं। घर से निकलने की यह उनकी शुरुआत थी उन्होंने दुनिया के कई देशों का भ्रमण किया और अंत में भारत पहुंची। वह नई दिल्ली से दो घंटे की दूरी पर बसे पवित्र शहर वृंदावन (कृष्ण की भूमि) में बस गईं, वहां जगतारिणी ने 12 वर्ष भक्तिवेदांत गुरुकुल में गुजारे।
उन्हें इस पवित्र और प्राचीन भूमि के बारे में पूरी जानकारी और भ्रमण करने में भी ज्यादा समय नहीं लगा। 1980 के दशक में एक आधुनिक पश्चिमी महिला के लिए वृंदावन की संस्कृति में प्रवेश करना मुश्किल था, लेकिन जगतारिणी ने लोगों का विश्वास जीतने के लिए कड़ी मेहनत की। आखिर क्यों मन की बात में बोले पीएम मोदी-' मैं आज भी सत्ता में नहीं…'आखिर क्यों मन की बात में बोले पीएम मोदी-' मैं आज भी सत्ता में नहीं…' वृंदावन के बारे में जगतारिणी ने सब जाना वृंदावन के बारे में जगतारिणी ने सब जाना जगतारिणी को वृंदावन के लोगों ने भी धीरे-धीरे अपनाया और उन्हें उनके जीवन और आध्यात्मिक परंपराओं में झांकने का मौका दिया। वह पूरे दिन भगवान कृष्ण की कहानियां सुना करती थीं।
समय के साथ वह खुद वृंदावन में एक गाइड के तौर पर बाहर से आने वाले लोगों को शहर घुमाने लगीं, जो उन्होंने सीखा उसे अपने लोगों से साझा किया। वृंदावन के अलावा जगतारिणी आस-पास के कई धर्मस्थलों की यात्रा की। ऑस्ट्रेलिया में सताने लगी थी वृंदावन की याद ऑस्ट्रेलिया में सताने लगी थी वृंदावन की याद वह भारत के स्थानीय परंपराओं के बारे में जानने और सीखने के लिए उत्सुक रहा करती थीं। भारत घूम लेने के बाद उनका परिवार 1996 में ऑस्ट्रेलिया वापस चला गया। जगतारिणी के लिए वृंदावन उनका घर बन गया था, उन्हें यहां की याद सताने लगी। एक दिन भारत से उनके एक दोस्त ने अपने निधन से पहले जगतारिणी को भगवान कृष्ण की करीब एक इंच जितनी छोटी मूर्ति भेजी।
