शहीद टंट्या मामा की शहीद स्थली जबलपुर जेल से पवित्र मिट्टी खण्डवा ले जाई जाएगी

भोपाल

अमर शहीद टट्या मामा की केन्द्रीय जेल, जबलपुर स्थित शहीद स्थली से पवित्र मिट्टी सम्मानपूर्वक खण्डवा ले जाई जाएगी। इस गरिमामय कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रदेश के लोक निर्माण कुटीर एवं ग्रामोद्योग और जबलपुर जिले के प्रभारी मंत्री गोपाल भार्गव होंगे।

कलेक्टर कर्मवीर शर्मा ने आज सेंट्रल जेल जबलपुर का दौरा कर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी टंट्या मामा की शहीद स्थली और कार्यक्रम स्थल को देखा।

"महान क्रांतिकारी टंट्या मामा"

जननायक टंट्या मामा का जन्म वर्ष 1842 में तत्कालीन मध्यप्रांत और आज के मध्यप्रदेश के खंडवा जिले के पंधाना तहसील के ग्राम बड़ौदा अहीर में एक भील जनजाति परिवार में हुआ। उनके पिता जी का नाम भाऊ सिंह भील था। वह कृषि कार्य द्वारा अपनी आजीविका अर्जित करते थे।

अंग्रेजों द्वारा लाई गई नई भू-राजस्व व्यवस्था के कारण इस क्षेत्र के जनजातीय समाज को मुश्किलें उठानी पड़ रही थीं। इसी शोषणकारी ब्रिटिश भू-राजस्व व्यवस्था के चलते टंट्या एक विवाद में फँसे जिसके बाद ब्रिटिश राज्य के दमनकारी स्वरूप से उनका प्रत्यक्ष साक्षात्कार हुआ। उसके बाद एक आम जनजातीय व्यक्ति एक महान क्रांतिकारी योद्धा के रूप में परिवर्तित हो गया।

जननायक टंट्या ने ब्रिटिश शासन के द्वारा ग्रामीण जनजातीय समाज के विरूद्ध हो रहे शोषण और अत्याचारों के विरूद्ध आवाज उठाई। उन्हें अनेक बार पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर यातनाएँ दी गई परन्तु उन्होंने अपना संघर्ष जारी रखा। वर्ष 1874 से 1889 तक वह अपने अत्यंत सीमित साधनों से शक्तिशाली ब्रिटिश शासन का पुरजोर विरोध करते रहे।

अगस्त 1889 में उन्हें गिरफ्तार कर पहले इंदौर और फिर 28 अगस्त को जबलपुर जेल भेज दिया गया। यहीं उनपर मुकदमे की कार्यवाही चलाई गई और त्वरित कार्यवाही करते हुए जबलपुर के सेशन जन लिंडसे नील ने 18 अक्टूबर को उन्हें फाँसी की सजा सुना दी। ऐसा माना जाता है कि केन्द्रीय जेल जबलपुर में 4 दिसंबर को फाँसी देने के बाद इंदौर के निकट पातालपानी रेलवे स्टेशन के नजदीक उनका शव फेंक दिया गया था, जहाँ स्थानीय निवासियों द्वारा उनके सम्मान और स्मृति में एक मंदिर का निर्माण कराया गया।

द न्यूयार्क टाइम्स के 10 नबम्बर 1889 के अंक में टंट्या मामा के विषय में प्रमुखता से खबर प्रकाशित हुई थी। इसमें उन्हें भारत का रॉबिनहुड बताया गया था। इसका कारण यह बताया जाता है कि टंट्या मामा अंग्रेजों का सरकारी खजाना और अंग्रेजों के चाटुकारों का धन लूटकर जरूरत मंदों और गरीबों में बाँट देते थे। उनके लोकोपकारी कार्यों के चलते वह मामा के नाम से विख्यात हुए। जनजातीय समाज के लिए किये गये उनके कार्यों के प्रति उनकी इस लगन ने उन्हें एक लोकदेवता का दर्जा प्रदान किया है।

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