मोदी के ‘मास्टरस्ट्रोक’ से छिना विपक्ष का मुद्दा, अब संसद में सरकार को कैसे घेरेंगी पार्टियां?

नई दिल्ली
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा तीन कृषि कानूनों की वापसी के ऐलान से विपक्ष के हाथ से एक बड़ा मुद्दा छिन गया है। हालांकि, इस फैसले से संसद के बाहर और भीतर विपक्ष का रुख पहले की तुलना में ज्यादा आक्रामक हो सकता है। वह सरकार की घेराबंबदी के लिए नए मुद्दों की तलाश तेज कर सकता है। विपक्ष नागरिकता कानून के मुद्दे को भी नये सिरे से उठा सकता है।

उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों से ठीक पूर्व सरकार के इस कदम को नपा-तुला राजनीतिक कदम माना जा रहा है। यह माना जा रहा है कि सरकार ने किसान आंदोलन के नफा-नुकसान के आकलन के बाद ही यह फैसला लिया होगा, जिसे अब एक साल पूरा होने जा रहा है। लेकिन उत्तरी राज्यों खासकर यूपी में किसान आंदोलन के मुद्दे पर विपक्ष भाजपा की घेराबंदी कर उसे हराने की जुगत में था। लेकिन ठीक चुनावों से पहले प्रधानमंत्री के कृषि कानूनों की वापसी का ऐलान करना विपक्ष की रणनीति के लिए एक बड़ा झटका है। राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि इस प्रकार विपक्ष के हाथ से एक बड़ा मुद्दा निकल गया है। जिस प्रकार प्रधानमंत्री ने कृषि कानूनों की वापसी के ऐलान के वक्त अपनी बात रखी, उससे स्पष्ट है कि वह किसानों का हित चाहते थे लेकिन उनकी तपस्या में ही कोई कमी रह गई है। इसलिए किसानों की नाराजगी देर सवेर खत्म होनी तय है।

केंद्र की भाजपा सरकार के खिलाफ विपक्ष के पास पिछले सात सालों में जो बड़े मुद्दे हाथ लगे थे, वह राफेल, नोटबंदी, महंगाई के अलावा मौजूदा किसान आंदोलन था। राफेल, नोटबंदी के मुद्दे विपक्ष के काम नहीं आए। महंगाई के मुद्दे को भी विपक्ष नहीं भुना पाया। इनमें किसानों का मुद्दा सबसे बड़ा था जो उत्तर से दक्षिण तक असर डाल सकता था। विपक्ष को यह भी उम्मीद थी कि इस मुद्दे को लोकसभा चुनाव तक खींचा जा सकता है। लेकिन कृषि कानूनों की वापसी से विपक्ष के हाथ से एक मुद्दा भले ही निकल गया हो लेकिन सरकार के इस कदम से विपक्ष का आक्रामक होना तय है। विपक्ष विरोध के नए मुद्दे उठा सकता है। नागरिकता जैसे कानून पर नये सिरे से विरोध खड़ा किया जा सकता है। भविष्य में बनने वाले कानूनों पर विपक्ष अड़ंगे डाल सकता है।

आंदोलनकारी किसानों के साथ-साथ विपक्ष की भी जीत
दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर और राजद के प्रवक्ता सुबोध कुमार मेहता का कहना है कि कानूनों को वापस लेने से स्पष्ट है कि सरकार ने यह स्वीकार कर लिया है कि इन्हें बनाने का उसका पहले का फैसला गलत था। भले ही वह कोई भी सफाई पेश करे। यह आंदोलनकारी किसानों के साथ-साथ विपक्ष की भी जीत है, क्योंकि संसद में विपक्ष ने इन कानूनों के पारित होने का विरोध किया था। इससे विपक्ष को सरकार द्वारा लिए जाने वाले एकतरफे फैसलों के खिलाफ मुखर होने का मौका मिलेगा, क्योंकि अब रास्ता खुल गया है।

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