राजस्व शुद्धिकरण: खसरा नम्बरों में सरकारी जमीन के हेरफेर का खुलासा करेगा अभियान

भोपाल
राज्य सरकार द्वारा राजस्व अभिलेखों के शुद्धिकरण के लिए चलाए जा रहे अभियान के दौरान रिक्त क्षेत्रफल और शून्य क्षेत्रफल वाले खसरा नम्बरों के सुधार के दौरान शासकीय जमीन में हेराफेरी के मामले सामने आ सकते हैं। इसमें दस साल पहले तक खसरों में हाथों से की जाने वाली एंट्री के चलते शासकीय जमीन निजी करने के मामलों का खुलासा हो सकता है। ऐसे 15 लाख से अधिक खसरा नम्बर सरकार ने चिन्हित किए हैं जिसमें रिक्त और शून्य क्षेत्रफल दर्ज किया गया है।

प्रदेश में 896984 खसरों के कालम नम्बर 5 में भूमिस्वामी के नाम नहीं लिखे गए हैं जबकि संबंधित भूमिस्वामी का नाम दर्ज होना आवश्यक है। इन्हें रिक्त क्षेत्रफल वाले खसरा नम्बरों की कैटेगरी में शामिल किया गया है। नियमानुसार यदि भूमि शासकीय है तो शासन और निजी है तो संबंधित भूमिस्वामी का नाम दर्ज होना चाहिए। राजस्व विभाग द्वारा तैयार किए गए 15 अगस्त 2021 तक के आंकड़ों में स्थिति है। इसका सुधार खसरा सुधार माड्यूल के जरिये कराया जा रहा है। दस नवम्बर की स्थिति में 154092 खसरों में सुधार का काम किया जा चुका है। इसी प्रकार प्रदेश में 611775 खसरों में भूमि का क्षेत्रफल शून्य है।

नियमानुसार किसी भी खसरा में भूमि स्वामी के नाम के आगे दर्ज भूमि का क्षेत्रफल शून्य नहीं होना चाहिए लेकिन इतनी अधिक संख्या में शून्य क्षेत्रफल दर्ज होने के कारण विभाग के काम में दिक्कत भी होती है। दस नवम्बर की स्थिति में 120424 खसरों मे सुधार कराया जा चुका है। राजस्व अभिलेख शुद्धिकरण अभियान के जरिये इसे दुरुस्त कराने का काम इसी के चलते सरकार करा रही है।

अफसरों के मुताबिक रिक्त भूमि वाले खसरे ऐसे हैं जिसमें सर्वे नम्बर और रकबा नम्बर डले हैं लेकिन भूमि स्वामी का नाम नहीं लिखा है। ऐसे में माना जा रहा है कि पूर्व के सालों में राजस्व महकमे के अफसरों ने शासकीय जमीन के नम्बर पर निजी स्वामी दर्ज कर दिया हो लेकिन 1959 के अभिलेख के आधार पर अब ये भूमिस्वामी खसरा नम्बरों से गायब हो गए हों। दूसरी ओर यह भी कहा जा रहा है कि पूर्व में चूंकि पटवारी हाथ से खसरे में एंट्री करते थे। इसलिए जब साफ्टवेयर में अपलोड करने का काम शुरू हुआ तो पटवारियों ने शामिल नम्बर बनाकर दो खसरा नम्बरों को एक ही रकबे में दर्ज कर दिया।

अब नक्शे बनते जा रहे हैं तो खसरा नम्बर के आधार पर रकबा भी अलग होता जा रहा है। दूसरी ओर शून्य क्षेत्रफल को लेकर तर्क दिए जा रहे हैं कि 2003-04 से शुरू हुई खसरों के एनआईसी और वेब जीआईएस साफ्टवेयर में एंट्री प्रक्रिया के चलते कम्प्यूटर ने अपने आप ऐसे खसरा नम्बर जनरेट कर दिए जो वजूद में नहीं हैं। मूल खसरा नम्बरों के बटांक बनाने पर मूल खसरा नम्बर डिलीट किया जाना चाहिए था जो नहीं किए गए और उसके सामने शून्य लिख दिया गया है। इसमें यह आशंका जताई जा रही है कि यदि जानबूझकर किसी खसरा नम्बर के सामने शून्य लिखा गया है तो इसकी भी असलियत सामने आ जाएगी।

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