रासायनिक खाद छोड़ जैविक खेती से जुड़ रहे किसान

दुर्ग
शासन कि योजना नरवा, गरवा, घुरवा और बाड़ी किसानों के जीवन में रंग लाने लगी है। गोधन न्याय योजना के अंतर्गत खरीदे जाने वाले गोबर से जो वर्मी और कंपोस्ट खाद बनाये जा रहे हैं, उसी का परिणाम है कि जिले के किसान पुन: जैविक खेती से जुड़ रहे है। परंपरागत कृषि का विकास हो इसके लिए प्रशासन के द्वारा सकारात्मक कदम उठाये जा रहे है। इस वर्ष रासायनिक खादों के कच्चे माल की आपूर्ति से बाजार में रासायिनक खाद की कमी थी, लेकिन शासन कि दूर दृष्टिता के चलते जिले के किसानों के लिए वर्मी एवं कंपोस्ट खाद की उपलब्धता पर्याप्त माक्षा में थी जिसके चलते किसान ने बिना किसी बाधा के जैविक खेती की।

वर्तमान में जिले के सभी पंचायतों में किसान चौपाल का आयोजन भी किया गया था। जिसमें किसानों की खेती संबंधित समस्याओं को सुनकर उसका निदान करने का प्रयास भी किया गया था और कृषकों को बीज के साथ-साथ जैविक खेती से संबंधित जानकारियां भी मुहैया कराई गई थी। कृषि समन्वयकों द्वारा वर्मी कंपोस्ट खाद में केचुएं के महत्व को किसानों को बताया गया कि कैसे केचुएं भूमि की मिट्टी को लगातार पल्टकर मिट्टी की उर्वरक क्षमता को बढ़ाते हैं।

बोरई के कृषक झवेन्द्र वैष्णव ने बताया कि वो इससे पहले अपने खेतो में रासायनिक खाद का उपयोग करते थे परंतु इस वर्ष मार्केट में डीएपी की किल्लत होने के कारण उसने बीच का रास्ता अपनाते हुए, अपने पांच एकड़ जमीन में से एक एकड़ जमीन में जैविक खेती करने का फैसला लिया। जिसके लिए कृषि विभाग के द्वारा उसे इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय से छत्तीसगढ़ देवभोग सुगंधित धान मुहैया कराया गया। उन्होंने बताया कि इस खेत में उन्होंने पूर्ण रूप से वर्मी कंपोस्ट खाद का उपयोग किया है और फसल के परिणाम से वो बहुत ही खुश है। उनका खेत धान की बालियों से खचा-खच भरा हुआ था। बीते वर्ष में एक एकड़ में 15 क्विटल धान की औसत उपज प्राप्त हुई थी परंतु इस वर्ष उन्होंने 16 क्विटल धान का उत्पादन किया। इस परिणाम से संतुष्ट होकर उन्होंने भविष्य में अपने पूरे पांच एकड़ खेत में जैविक खेती करने का निर्णय लिया है।

डॉ. टीकम सिंह साहू ने बताया कि उनके बड़े-बुढ़े अपने समय में केवल गोबर के खाद का उपयोग खेती के लिए किया करते थे। समय के साथ इसमें बदलाव आया और आने वाली पीढ़ी रसायनिक खाद का उपयोग करने लगी। लेकिन राज्य शासन ने जिस प्रकार नरवा, गरवा, घुरवा, बाड़ी योजना के तहत् ग्रामीण संस्कृति को पुन: स्थापित किया है। उससे भविष्य में पुन: परंपरागत खेती की वापसी होगी। आज वो भी अपने खेतों में जैविक खेती कर रहे हैं और बताते हैं कि इसस उन्हें सघन और नियत ऊचांई की फसल प्राप्त हो रही है। जिन खेतों में उन्होंने रसायनिक उर्वरक का उपयोग किया था उस फसल में बालियां भी कम आई हैं और रसायनिक उर्वरक के प्रभाव से फसल की ऊंचाई बहुत ज्यादा होने के कारण फसल जमीन पर गिर गई है। जिन खेतों में विगत वर्षों से वो जैविक खेती कर रहे हैं उस खेत की मिट्टी में संतुलित नमी होती है जो कि फसल के लिए बहुत अच्छी है इससे उन्हें स्वस्थ्य खाद्यान्न प्राप्त हो रहा है। वर्तमान में उनके पास एक गाय और एक बैल है परंतु उनकी योजना है कि भविष्य में वो इनकी संख्या बढ़ाएंगे ताकि घर में ही वर्मी कम्पोस्ट खाद बना सकें। पशुपालन के रूप में टीकम सिंह बकरी पालन करने का भी सोच रहे है।

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