कोयला छोड़ने की योजना में भारत भी हिस्सेदार बना
दिल्ली
इंडोनेशिया और फिलीपींस और दक्षिण अफ्रीका के साथ भारत भी क्लाइमेट इन्वेस्टमेंट फंड्स (CIF) की अरबों डॉलर की उस योजना का हिस्सा होगा जिसके तहत कोयले को छोड़कर नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों की ओर जाने को गति देने का प्रस्ताव है.भारत, इंडोनेशिया, फिलीपींस और दक्षिण अफ्रीका कोयले से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के 15 फीसदी के लिए जिम्मेदार हैं. इस योजना का मकसद उत्सर्जन में कटौती की गति तेज करना है ताकि 2050 तक नेट जीरो उत्सर्जन हासिल करने के लक्ष्य के और करीब पहुंचा जा सके. इंडोनेशिया के ऊर्जा मंत्री अरिफिन तसरीफ ने कहा कि उनका देश कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों को बंद कर उनकी जगह नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों पर निर्भरता बढ़ाने को लेकर प्रतिबद्ध है. एक बयान जारी कर उन्होंने कहा, "जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक चुनौती है जिससे निपटने के लिए सभी पक्षों उदाहरण पेश करने होंगे" साआईएफ ने कहा कि एक्सलरेटिंग कोल ट्रांजीशन (एसीटी) योजना के तहत सबसे पहले ऐसे विकासशील देशों को लक्ष्य किया जा रहा है जिनके पास कोयले पर निर्भरता कम करने के लिए समुचित साधन नहीं हैं. दक्षिण अफ्रीका ने मंगलवार को कहा था कि वह एसीटी से लाभान्वित पहला देश होगा. सात देश देंगे मदद सीआईएफ के मुताबिक इस नई योजना को सात सबसे विकसित समर्थन दे रहे हैं और अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, कनाडा और डेनमार्क ने इसके लिए वित्तीय समर्थन दिया है.
डेनमार्क ने कहा है कि वह इस योजना के लिए 1.55 करोड़ डॉलर यानी लगभग एक अरब 15 करोड़ रुपये का अनुदान देगा ताकि "कोयला बिजली संयंत्रों को खरीदकर बंद किया जा सके और नए ऊर्जा स्रोतों में निवेश किया जा सके" डेनमार्क के विदेश मंत्री येप्पे कोफोड ने कहा, "कोल ऊर्जा संयंत्रों को बंद करने के लिए हमें एक स्थायी और स्थिर योजना की जरूरत होगी. मिसाल के तौर पर हमें यह सुनिश्चित करना होगा स्थानीय आबादी के लिए वैकल्पिक रोजगार और उन्हें दोबारा ट्रेनिंग उपबल्ध हो" ग्लोबल वॉर्मिंग के लिए कोयला सबसे अधिक जिम्मेदार जीवाश्म ईंधन है. सीआईएफ के प्रमुख मफाल्दा डुआर्टे कहते हैं कि पर्यावरण के अनुकूल भविष्य की राह में कोयला एक बड़ा रोड़ा है. डुआर्टे कहते हैं, "बाजार अब सही दिशा में बढ़ना शुरू कर रहे हैं लेकिन यह स्थानांतरण उस गति से नहीं हो। रहा है जितना जलवायु संकट की आपातकालीन स्थित से निपटने के लिए जरूरी है" सीआईएफ को 2008 में दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं ने गरीब देशों की कोयले और अन्य जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने के लिए बनाया गया था. यह ऐसी परियोजनाओं में निवेश करेगा जिनके जरिए विकासशील देशों की ऊर्जा हस्तांतरण की क्षमताओं को बढ़ाया जा सके.
