फेसबुक बन गई मेटा, लेकिन क्या है मेटावर्स?
दिल्ली
टेक वर्ल्ड यानी तकनीकी कंपनियों के बीच एक शब्द की बहुत चर्चा है – मेटावर्स. इस शब्द का जादू ऐसा चढ़ा है कि फेसबुक ने अपना नाम बदलकर मेटा रख लिया है. पर असल में मेटावर्स होता क्या है?साइंस फिक्शन लिखने वाले नील स्टीफेन्सन ने 1992 में अपने उपन्यास ‘स्नो क्रैश' के लिए यह शब्द – मेटा- गढ़ा था. स्टीफेन्सन की कल्पना सच के इतने करीब पहुंच गई है कि फेसबुक के सीईओ मार्क जकरबर्ग ने गुरुवार को ऐलान किया कि वह अपनी कंपनी का नाम बदलकर मेटा प्लैटफॉर्म्स इंक या छोटे में कहें तो मेटा रख रहे हैं. पर इस शब्द के जादू के शिकार सिर्फ जकरबर्ग नहीं हैं. दुनियाभर की तकनीकी कंपनियां इस वक्त मेटावर्स में ही भविष्य खोज रही हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि यह भविष्य का इंटरनेट हो सकता है, जिसमें वर्चुअल रिएलिटी और अन्य तकनीकों की मिश्रण कर संवाद यानी एक दूसरे से बातचीत एक अलग स्तर पर पहुंच जाएगी. वैसे कुछ विशेषज्ञ इसे लेकर चिंतित भी हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इस तकनीक के जरिए इतना निजी डेटा टेक कंपनियों तक पहुंच जाएगा कि निजता की सीमा पूरी तरह खत्म हो जाएगी. क्या है मेटावर्स? आप यूं समझिए कि इंटरनेट जिंदा हो जाए तो क्या होगा. यानी जो कुछ भी वर्चुअल वर्ल्ड में, स्क्रीन के पीछे हो रहा है, वह एकदम आपके इर्द गिर्द होने लगे. यानी आप स्क्रीन को देखेंगे नहीं, उसके भीतर प्रवेश कर जाएंगे. इस रूप में देखा जाए तो कल्पना की कोई सीमा नहीं है. मिसाल के तौर पर अब आप वीडियो कॉल करते हैं.
