आदिवासी ऋण की स्थिति का आंकलन के अध्ययन में चौंकाने वाला खुलासा, सरकार जल्द करेगी बैठक
भोपाल
एक ओर राज्य सरकार आदिवासियों के जीवन स्तर में बदलाव को लेकर उन्हें हर संभव सुविधाएं देने की तैयारी में जुटी है, दूसरी ओर प्रदेश में आदिवासी ऋण की स्थिति का आंकलन करने के मामले में राज्य सरकार द्वारा कराए गए अध्ययन में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। अटल बिहारी वाजपेयी सुशासन और नीति विश्लेषण संस्थान (एआईजीजीपीए) भोपाल ने मध्य प्रदेश में आदिवासी ऋणग्रस्तता पर एक अध्ययन किया और इसकी रिपोर्ट सरकार को सौंपी है। इसमें कहा गया है कि तमाम योजनाओं के बावजूद आदिवासी परिवारों के कर्ज में डूबे होने की मजबूरी उनका शोषण और जागरुकता की कमी है। सुशासन और नीति विश्लेषण संस्थान की रिपोर्ट पर राज्य सरकार इसी माह बैंकर्स के साथ संवाद करने वाली है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि गिरवी रखने योग्य परिसम्पत्तियों को अधिक से अधिक बढ़ावा देने का प्रयास किया जाना चाहिए। ऋण स्वीकृति प्रक्रिया का सरलीकरण करने की जरूरत बताते हुए इलेक्ट्रानिक आधार को बढ़ावा देने की बात कही गई है। प्रदेश में आदिवासी आबादी के मामले में शीर्ष पांच जिले अलीराजपुर, बड़वानी, झाबुआ, मंडला और डिंडोरी हैं। इनके रहवास वाले क्षेत्रों में स्वास्थ्य की स्थिति खराब है। शिक्षा, बुनियादी ढांचा और औपचारिक संस्थान की भी दिक्कतें हैं। इनके लिए वित्तीय ऋणग्रस्तता एक शाश्वत सत्य है जिसके लिए गरीबी उन्मूलन, आजीविका सृजन और तकनीकी हस्तक्षेप के बावजूद ऋणग्रस्तता की दुर्दशा बरकरार है।
अध्ययन से पता चला है कि सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद ग्रामीण परिदृष्य में निजी साहूकार की मौजूदगी इन ग्रामीणों की गरीबी को कम नहीं होने दे रही है। स्टडी में यह बात भी सामने आई है कि अधिकांश आदिवासी परिवार कृषि में लगे हुए हैं। इनमें से एक तिहाई सीमांत और लघु जोत श्रेणी के हैं। कृषि के साथ दैनिक श्रम और प्रवासी श्रम करके ये अपना जीवन बिता रहे हैं पर परिवारों के बीच ऋण ग्रस्तता कम नहीं हो रही है। अध्ययन के दायरे में आए 65 प्रतिशत परिवार किसी न किसी तरह के कर्ज में डूबे मिले हैं। ये कर्ज के लिए निजी साहूकारों से सीधे संपर्क करने को आसान मानते हैं और यही गरीबी की वजह है। अध्ययन के दौरान 60 प्रतिशत परिवारों ने बताया है कि इनके कर्ज की मुख्य वजह खाद, बीज, कीटनाशक, शादी और अन्य सामाजिक समारोह हैं।
आदिवासी परिवारों की स्थिति का अध्ययन करने वाले सुशासन संस्थान ने इसको लेकर जो सुझाव सरकार को दिए हैं, उसमें कहा गया है कि पैक्स को बढ़ावा देकर बिना सिक्योरिटी के कृषि ऋण देने का प्रावधान किया जाना चाहिए। इन सोसायटियों को वित्त पोषित किया जाना चाहिए ताकि सदस्यों को अपेक्षित क्रेडिट और पर्याप्त समय पर उपलब्ध हो सके। कृषि के लिए अल्पकालीन ऋण लोगों के कर्जदार होने की वजह है।
इसलिए सरकार को चाहिए कि भूमि रिकार्ड की व्यापक अनुपस्थिति को कम किया जाए।साथ ही लोन लेने के दौरान आवेदक के विवरण के आधार पर सत्यापन करने, जागरुकता शिविरों के माध्यम से योजनाओं की जानकारी देने के लिए भी काम करने की जरूरत है। इस तरह के शिविर लगाने की व्यवस्था स्थानीय बैंकों और संबंधित विभागीय जैसी संवितरण एजेंसियों द्वारा की जानी चाहिए। रिपोर्ट में बैंकों के अधिकारियों द्वारा भी शोषण किए जाने की बात कही गई है।
