संक्रमित स्थान में बैठाकर मरीजों का निकाला जा रहा ब्लड, नियमों की धज्जियां उड़ाते निजी लैब संचालक
जांजगीर-चांपा
एक ओर जहां पूरा देश कोरोना की विषम परिस्थिति से जूझ रहा है, वहीं दूसरी ओर जिले में संचालित अधिकांश लैब संचालक कमीशन के चक्कर में मरीजों की जान की परवाह किए बिना ही उनके स्वजनों से मोटी रकम लेकर जांच कर रहे हैं। जिले में स्वास्थ्य विभाग की उदासीता का खामियाजा जिलेवासियों को भुगतना पड़ रहा है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा लैबों को निर्धारित मापदण्ड के अनुसार ही संचालन की अनुमति दी जाती है, मगर जांच के अभाव में नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए लैब संचालित किया जा रहा है। जिले में संचालित लैबों में मरीज मोटी रकम देकर भी ठगे जा रहे हैं। यहां खुली जगह में बैठाकर उनका सैंपल लिया जा रहा है।
कोरोना के लगातार बढ़ते संक्रमण को देख विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा संक्रमण को महामारी घोषित किया गया है। देश में लगातार संक्रमण बढ?े मामलों को गंभीरता से लेते हुए केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा जिले में स्वास्थ्य व्यवस्था सुधारने के लिए करोड़ों रूपए खर्च किए, मगर जिले में विभाग के अधिकारियों व निजी संस्थानों के मनमाने रवैये का खामियाजा आज भी मरीजों को भुगतना पड़ रहा है। आज भी जिले में कमीशन के चलते गरीब वर्ग के लोगों को इलाज के लिए भटकना पड़ रहा है। जिला मुख्यालय सहित नगरीय निकायों में अधिकांश लैबों में कमीशन के चक्कर में शासकीय अस्पतालों में महज 100 रूपए की जांच के लिए 500 से लेकर 1 हजार रूपए तक चुकाना पड़ रहा है, मगर यहां तीगुनी, चौगुनी रूपए से अधिक कीमत चुकाने के बाद भी सुविधाओं के लिए भटकना पड़ रहा है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा निजी लैब संचालकों को नर्सिंग होम एक्ट के तहत मापदंड पूरा करने के बाद ही लैब संचालित करने की अनुमति दी जाती है, मगर जिला मुख्यालय सहित सभी नगरीय निकायों में नर्सिंग होम एक्ट की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही है। जानकारी के अनुसार नर्सिंग होम एक्ट के तहत लैबों का संचालन ग्रांउड फ्लोर में किया जाना है, ताकि यहां पहुंचे मरीज आसानी से लैब के अंदर पहुंचकर जांच करा सकें, मगर जिला मुख्यालय में संचालित एसजे लैब सहित कई लैब नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए संचालित हो रहे हैं। यहां विभागीय उदासीनता व लैब संचालकों के मनमाने रवैये का खामियाज मरीजों को भुगतान पड़ रहा है। जानकारी के अनुसार जिला मुख्यालय के अधिकांश डाक्टर कमीशन के चक्कर में यादव काम्प्लेक्स में संचालित एसजे लैब की रिपोर्ट को ही मान्य करते हैं, जबकि नगर में दर्जन भर से अधिक लैब संचालित है। यादव काम्प्लेक्स में एसजे लैब का संचालन प्रथम तल में किया जाता है जबकि यह ग्राउंड फ्लोर में संचालित किया जाना है। यहां गंभीर मरीज के आने पर उनके स्वजनों को दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में लैब कर्मी नीचे स्टूल लेकर खुली जगह पहुंचकर उनका सैंपल लेते हैं। जिस जगह सैंपल लिया जाता है वह खुली जगह होने के कारण यहां गंदगी भी रहती है। दिन भर लोगों को यहां आना-जाना लगा रहता है। ऐसे में मरीजों को सैंपल देने में भी परेशानी होती है। वहीं भीड़भाड़ वाली जगह होने के चलते संक्रमण प?ैलने का भी खतरा बना रहता है, बावजूद इसके लैब संचालक लोगों की परवाह किए बिना ही लैब का का संचालन किया जा रहा है।
नर्सिंग होम एक्ट की उड़ रही धज्जियां
राज्य शासन द्वारा निजी अस्पताल व लैबों में लगातार शिकायत मिलने के बाद नर्सिंग होम एक्ट लागू किया गया है, ताकि यहां पहुंचे मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा मिल सके। शासन द्वारा जिले में स्वास्थ्य व्यवस्था सुधारने की जिम्मेदारी स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों को दी गई है। यहां सीएमएचओ कार्यालय द्वारा ही उन्हें संचालन करने की अनमुति दी जाती है, मगर जिले में जिम्मेदार अधिकारियों की उदासीनता के चलते एक्ट की धज्जियां उड़ाते हुए अस्पताल व लैब संचालित किए जा रहे हैं। जिसका खामियाजा मरीजों को भुगतना पड़ रहा है। जिला मुख्यालय सहित अन्य नगरीय निकायों व ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकांश अस्पताल व निजी लैब नर्सिंग होम एक्ट की धज्जियां उड़ाते हुए संचालित हो रहे हैं, यदि जिला मुख्यालय में यह हाल है तो ग्रामीण क्षेत्रों की स्वास्थ्य व्यवस्था का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
कमीशन के चक्कर में बढ़ रहा आर्थिक बोझ
राज्य शासन सहित स्वास्थ्य संचालनालय के अधिकारियों द्वारा लगातार संबंधित अधिकारियों की बैठक लेकर स्वास्थ्य व्यवस्था सुधारने के लिए करोड़ों रूपए आबंटित करने किया जा रहा है, मगर जिले में जिम्मेदार अधिकारी कमीशन में मशगूल है, जिसका खामियाजा शासकीय अस्पताल पहुंचे गरीब वर्ग के लोगों को भुगतना पड़ रहा है। जिला अस्पताल सहित सभी शासकीय अस्पतालों हर वर्ष करोड़ों रूपए खर्च करने के बाद भी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। ऐसे में अधिकांश जांच निजी लैबों में कराया जा रहा है, मगर लैब संचालकों के मनमानी का खायिमाजा मरीज के स्वजनों को भुगतना पड़ रहा है। यहां कमीशन के चक्कर में महज 100 रूपए में होने वाली जांच के गरीब वर्ग के लोगों को निजी लैबों में 500 से 1000 रूपए तक देना पड़ता है। यहां निर्धारित मूल्य से कई गुना अधिक कीमत पर सामान्य जांच की जाती है। ऐसे में गरीब वर्ग के लोग आज भी उपचार कराने के बाद कर्ज में डूब रहे हैं।
