ट्रेड यूनियन श्रम कानूनों की आड़ में जबरन वसूली नहीं कर सकतीं: हाई कोर्ट
कोच्चि
केरल हाई कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि वह अपने हाथ में कानून लेने वाली ट्रेड यूनियनों पर कार्रवाई क्यों नहीं कर रही है। कोर्ट का कहना था कि निवेशक इन मजदूर संगठनों की नोक्कुकुली जैसी मनमानी प्रथा की वजह से केरल में निवेश करने से डरते हैं।
ट्रेड यूनियन केरल के श्रम कानूनों की आड़ में जबरन वसूली करती हैं। इसे ही नोक्कुली नाम दिया गया है। इसके तहत मजदूर कोई बोझा लोड या अनलोड करवाने के लिए पहले तो भारी-भरकम रकम मांगते हैं। अगर व्यापारी किसी दूसरे माध्यम से वह लोडिंग या अनलोडिंग करवाते हैं तो मजदूर 'मजदूरी के नुकसान' के एवज में व्यापारी से पैसों की मांग करते हैं। इसे 'नोक्कुकुली' कहा जाता है। अगर उनकी मांग न मानी जाए तो वे हिंसा पर उतारू हो जाते हैं। इसे ऐसे समझा जा सकता है कि वे काम करने और न करने दोनों के पैसे मांगते हैं। इसके लिए केरल के हैडलोड वर्कर्स ऐक्ट का सहारा लिया जाता है।
जस्टिस देवन रामचंद्रन ने सरकार के इस दावे पर सवाल उठाया कि राज्य में इन्वेस्टर फ्रेंडली माहौल है। अदालत उस समय टीके सुंदरेसन नाम के व्यापारी की अपील पर सुनवाई कर ही थी। उसने नोक्कुकुली के खिलाफ पुलिस संरक्षण की मांग की थी।
कोर्ट का कहना था, 'केरल में निवेशकों के अनुकूल वातावरण है इसका केवल दावा करना काफी नहीं है वह हकीकत में दिखना भी चाहिए। सरकार कानून तोड़ने वाली ट्रेड यूनियनों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं कर रही है।' कोर्ट ने तिरुवनंतपुरम में इसरो परिसर में नोक्कुकुली के मसले पर हुए हंगामे की भी चर्चा करते हुए कहा कि ऐसी घटनाएं राज्य के लिए शर्मनाक हैं।
कुछ रोज पहले तिरुवनंतपुरम के इसरो परिसर में उपकरणों से लदे एक ट्रक को अनलोड करने के मसले पर मजदूरों ने हंगामा किया था। वे नोक्कुकुली के रूप में दस लाख रुपयों की मांग कर रहे थे। सीएम और श्रम मंत्री के दखल के बाद चार घंटों से चल रहा गतिरोध पुलिस ने समाप्त कराया और इसरो के उपकरण उतारे गए।
