बासमती चावल को GI टैग मिलने का रास्ता खुला, सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने की फिर बढ़ी उम्मीद
भोपाल
मध्य प्रदेश के कई जिले में पैदा होने वाले बासमती चावल को लम्बी कानूनी लड़ाई के बाद जीआई टैग मिलने की उम्मीदएक बार फिर बढ़ गई है. सर्व्वोच्च न्यायालय ने जीआई टैग देने की मांग वाली याचिका पर एमपी सरकार की दलील मंजूर कर ली है. सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए आदेश दिए हैं कि मद्रास हाईकोर्ट मध्य प्रदेश में उगाए जाने वाले बासमती चावल को जीआई टैग देने वाली याचिका पर पुनः सुनवाई करे..मध्य प्रदेश सरकार ने मध्य प्रदेश में उगाए जाने वाले बासमती चावल को जीआई टैग देने के लिए 8 साल पहले मद्रास हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी. लेकिन उसे हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद एमपी सरकार की याचिका खारिज कर दिया था. इसके बाद एमपी सरकार सुप्रीम कोर्ट गई थी.
एपीडा ने किया था इसका विरोध
बता दे मई 2010 में पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और कश्मीर में उगाए जाने वाले बासमती चावल को जीआई टैग मिला था. उसी दौरान मध्य प्रदेश सरकार की ओर से भी बासमती चावल को जीआई टैग देने की मांग की गई थी. लेकिन एग्रीकल्चर प्रोड्यूस एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी यानि एपीडा ने इसका विरोध किया था. इसके बाद मध्य प्रदेश सरकार ने चेन्नई में जीआई रजिस्ट्रार के यहां अपील दायर की थी. 2013 में फैसला एमपी के पक्ष में आया लेकिन इसी बीच पंजाब ने इसे लेकर आपत्ति दर्ज कराई और फिर फैसला एमपी के खिलाफ आया. बाद में मद्रास हाईकोर्ट ने जीआई टैग देने की एमपी सरकार की याचिका को खारिज कर दिया था.इसके बाद मध्य प्रदेश सरकार ने प्रदेश के किसानों के व्यापक हित को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की इस याचिका को निराकृत करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट को निर्देशित किया है कि मध्य प्रदेश की याचिका पर पुनः सुनवाई करें।
प्रदेश सरकार लड़ रही है लम्बी कानूनी लड़ाई
सोयाबीन और कपास की खेती के लिए मशहूर मध्य प्रदेश के करीब 13 जिलों में बासमती चावल की पैदावार होती है. इनमें मुरैना, भिंड, ग्वालियर, श्योपुर, दतिया, शिवपुरी, गुना, विदिशा, रायसेन, सीहोर, होशंगाबाद, जबलपुर, नरसिंहपुर जिले शामिल हैं. ये बासमती चावल बेहद उम्दा क्वालिटी का होता है इसलिए मध्य प्रदेश शासन इसे जीआई टैग दिलाने का प्रयास कर रहा है.उल्लेखनीय है कि जी आई टेक के अभाव में मध्य प्रदेश के मंडियों में बासमती उत्पादक किसानों को खरीददार नहीं मिलते और सीधे व्यापारियों को बेचने से उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ता है। कई बड़े किसान अपने बासमती धान को पंजाब की मंडी में बेचने ले जाते हैं इनसे उन्हें किराए भाड़े एवं अन्य व्यवस्थाओं के रूप में बड़ी धनराशि खर्च करने के बाद की उचित दाम मिल पाता है। किसानों की इस कठिनाइयों को देखते हुए ही मध्य प्रदेश सरकार लंबे अरसे से मध्यप्रदेश में उत्पादित बासमती चावल को जीआई टैग दिलाने के लिए प्रयासरत है और कानूनी लड़ाई भी लड़ रही है।
