अफगानिस्तान में तालिबान की केयरटेकर कैबिनेट का गठन, मोहम्मद हसन अखुंद प्रधानमंत्री

नई दिल्ली
अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के तीन सप्ताह के बाद  वहां अंतरिम सरकार का गठन हो गया है और यह देश अब आधिकारिक तौर 'इस्लामिक अमीरात ऑफ अफगानिस्तान' बन गया है। तालिबान की अंतरिम सरकार में मुल्ला मोहम्मद हसन अखुंद को प्रधानमंत्री बनाया गया है। पिछले दो दशकों से शूरा (लीडरशिप काउंसिल) का नेतृत्व कर रहे  मुल्ला हसन अखुंद तालिबान की पिछली सरकार में भी गवर्नर और मंत्री रह चुके हैं। तालिबान के सर्वोच्च नेता मुल्ला हबीबुल्लाह अखुंदजादा सरकार के संरक्षक होंगे और राजनीतिक, धार्मिक व सुरक्षा मामलों में उनका फैसला अंतिम होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि तालिबान ने सरकार का यह मॉडल ईरान से लिया है। ईरान में भी एक सर्वोच्च नेता होता है और पूरी सरकार का नियंत्रण उसके हाथों में ही होता है। सर्वोच्च नेता के तहत ही राष्ट्रपति सरकार चलाता है।  प्रधानमंत्री अखुंद  और उप प्रधानमंत्री अब्दुल गनी बरादर समेत अंतरिम सरकार के 33 मंत्रियों में से ज्यादातर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की प्रतिबंधितों की लिस्ट में शामिल हैं।

मोस्ट वॉन्टेड आतंकी गृह मंत्री
अब्दुल गनी बरादर के अलावा मुल्ला अब्दुल सलाम हनफी को भी उप-प्रधानमंत्री बनाया गया है। तालिबान की सरकार में आतंकी संगठन हक्कानी नेटवर्क के मुखिया सिराजुद्दीन हक्कानी को आंतरिक मामलों का मंत्री यानी गृह मंत्री बनाया गया है। हक्कानी अमेरिकी एजेंसी FBI की मोस्ट वॉन्टेड अतंकियों की लिस्ट में शामिल है और उसके सिर पर एक अरब अमेरिकी डॉलर का इनाम भी है। तालिबान के मुख्य प्रवक्ता ज़बीउल्लाह मुजाहिद ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि मुल्ला मोहम्मद हसन अखुंद को अहम जिम्मेदारी दी गई है। तालिबान के सह-संस्थापक रहे अब्दुल गनी बरादर को उप प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी दी गई है। मुल्ला गनी बरादर कतर में अमेरिका के साथ वार्ता में तालिबान का नेतृत्व कर चुके हैं। बरादर ने ही अमेरिका के साथ समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके तहत अमेरिका पूरी तरह अफगानिस्तान से बाहर निकल गया था। तालिबान की नई केययर टेकर सरकार में खैरूल्लाह खैरख्वाह को सूचना मंत्री बनाया गया है। उप सूचना मंत्री ज़बीउल्लाह मुजाहिद को बनाया गया है। उप विदेश मंत्रालय का प्रभार शेर अब्बास स्टैनकजई को दिया गया है। इसके अलावा तालिबान के कैबिनेट में न्याय मंत्री का पद भी बनाया गया है। अब्दुल हकीम को न्याय मंत्री बनाया गया है। 

मुल्ला उमर का बेटा रक्षा मंत्री
तालिबान के संस्थापक मुल्ला उमर के बेटे मुल्ला याकूब को रक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई है। काबुल में एक सरकारी कार्यालय में तालिबान के प्रवक्ता ज़बीउल्लाह मुजाहिद ने कहा, "यह सिर्फ कार्यकारी सरकार है और आगे पूरी सरकार के गठन पर काम होगा।  तब तक मुल्ला हबीबुल्लाह अखुंदजादा मंत्रिमंडल के संरक्षक होंगे।" तालिबान के प्रवक्ता ने आगे कहा कि हम देश के अन्य हिस्सों से भी लोगों को इस कैबिनेट में शामिल करने की कोशिश करेंगे। 

समावेशी सरकार का वादा
तालिबान ने अफगान के लोगों से वादा किया था कि देश में एक समावेशी सरकार बनाई जाएगी और महिलाओं के अधिकारों का ख्याल भी रखा जाएगा। तालिबान ने यह भी कहा था कि सरकार में शीर्ष स्तर पर महिलाओं की भागीदारी भी सुनिश्चित की जाएगी। तालिबान ने अमिर खान मुत्तकी को अपना विदेश मंत्री बनाया है। अमिर खान दोहा में तालिबान की मध्यस्थता कर चुके हैं। गौरतलब है कि तालिबान द्वारा लंबे वक्त से सरकार बनाने की तैयारी की जा रही थी। हालांकि, दो-तीन बार ऐलान टाल भी दिया गया था। माना जा रहा था कि तालिबान और हक्कानी नेटवर्क के बीच सत्ता संघर्ष को लेकर कुछ विवाद चल रहा है। लेकिन अब तालिबान ने सरकार गठन का ऐलान कर दिया है। लेकिन नई सरकार बनाने के बाद भी तालिबान के सामने चुनौतियां काफी हैं।   पहली सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इस सरकार में अलग-अलग लोगों और गुटों को कैसे तरजीह दी जाए? मौजूदा तालिबान कैबिनेट में कुछ अहम मंत्रालयों का ऐलान तो हो गया है लेकिन अभी भी इस गुट के अंदर कई ऐसे बड़े चेहरे हैं जिन्हें सरकार में जगह मिलने की उम्मीद है। ऐसे में इन सभी को तालिबान सरकार में कैसे शामिल किया जाएगा यह देखने वाली बात होगी। एक बात यह भी है कि हिब्तुल्लाह अख़ुंदज़ादा अभी तालिबान में नंबर वन है, लेकिन उनकी नेतृत्व क्षमता के बारे में लोगों को ज़्यादा नहीं पता है। तालिबान सरकार के सामने दूसरी चुनौती है देश को पटरी पर लाना। सरकार चलाने के लिए तालिबान को हर फील्ड के काबिल लोगों की ज़रूरत होगी। फिर चाहे वो नौकरशाह हों, एक्सपर्ट्स, डॉक्टर्स, क़ानून के जानकार या फिर कुछ और देखने वाली बात ये होगी कि तालिबान ऐसे तर्जुबेकार लोग कहां से लाता है। तालिबान के खिलाफ अफगानिस्तान में जगह-जगह प्रदर्शन हो रहे हैं। महिलाएं अपने अधिकारों की मांग को लेकर सड़क पर हैं। अपनी पुरानी छवि को बदलना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना पाना भी तालिबान के लिए चुनौती है। 
 

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