नवविवाहिता आज से करेंगी मां गौरी की अराधना, बासी फूल से की जाती है मां गौरी की पूजा

  पटना 
मिथिलांचल के लोक पर्व में सुहाग का अनोखा पर्व मधुश्रावणी व्रत श्रावण कृष्ण पंचमी बुधवार से शुरू हो रहा है। यह पर्व तेरह दिनों तक चलता है लेकिन इस बार कृष्ण पष्ठी पक्ष में ही षष्ठी तिथि दो दिन हो जाने से यह पंद्रह दिनों का हो गया है। इस पर्व में मिथिला की नवविवाहिता अपने पति की दीर्घायु के लिए माता गौरी की पूजा बासी फूल से करती हैं। एक दिन पहले संध्या काल में पुष्प, पत्र की व्यवस्था कर ली जाती है और उसी से माता पार्वती के साथ भगवान भोलेनाथ तथा विषहरी नागिन की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। पूरे अनुष्ठान के दौरान बिना नमक का भोजन ग्रहण करती हैं। इस पूजा में पुरोहित की भूमिका में भी महिलाएं ही रहती हैं। इस अनुष्ठान के पहले और अंतिम दिन विधि-विधान से पूजा होती है।

बासी फूल से माता गौरी की पूजा की परंपरा-

ज्योतिषाचार्य पंडित राकेश झा ने बताया कि मधुश्रावणी व्रत के दौरान मिथिला की नवविवाहिता पूजा के एक दिन पूर्व ही सखी, सहेलियों के संग सज-धज कर पारंपरिक लोकगीत गाते हुए बाग-बगीचे, फुलवारी, बगिया आदि से नाना प्रकार के पुष्प, पत्र को अपनी डाली में सजाकर लाती हैं और हर सुबह अपने पति की लंबी आयु के लिए उसी फूल से भगवती गौरी के साथ विषहर यानी नागवश की पूजा करती हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस दौरान माता पार्वती की पूजा का विशेष महत्व होता है। पूजा के माध्यम से सुहागन अपनी सुहाग की रक्षा के लिए कामना करती हैं। इस दौरान ठुमरी और कजरी गाकर देवी उमा को प्रसन्न करती हैं। मधुश्रावणी की पूजा के बाद हर दिन अलग-अलग कथाएं भी कही जाती हैं। इन लोक कथाओं में सबसे प्रमुख राजा श्रीकर और उनकी बेटी की है।

ससुराल से मिली सामग्री से होती है पूजा-

आचार्य विपेंद्र झा माधव कहते हैं कि मधुश्रावणी पूजा के दौरान नवविवाहित महिलाएं अपने मायके चली जाती हैं और वहीं इस पर्व को मनाती हैं। इस पूरे अनुष्ठान में उपयोग होने वाली सामग्री, वस्त्र, श्रृंगार प्रसाधन, पूजन की व्यवस्था, विवाहिता की भोजन सामग्री आदि सब कुछ ससुराल से ही आता है।

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