उन्नाव में एक अनोखा घाट, जहां पुरुष नहीं महिलाएं कराती हैं दाह संस्कार

 उन्नाव 
 अग्नये स्वाहा, अग्नये इदं न मम…. अब मृत देह पर घी मलकर बोलिए प्रेताय इदं न मम। हर हिन्दू श्मशान पर पुरुष कंठ से यही मंत्र गूंजते हैं, लेकिन अचलगंज (उन्नाव) में गंगा के बलाई घाट पर नारी स्वर में यह मंत्र सुने जाते हैं। इस घाट पर दो महिलाएं अंतिम संस्कार कराती हैं। उन्होंने पतियों की मौत के बाद उनके काम को विरासत की तरह खुद ही स्वीकार कर लिया है।

अचलगंज से करीब आठ किमी दूर बलाई घाट की रेत पर बैठी सुषमा पंडा की जिंदगी में इतवार नहीं आता। अचलगंज के हड़हा गांव की सुषमा के पति संतोष इसी घाट पर अंतिम संस्कार कराते थे। 12 साल पहले उनकी मौत हो गई थी। सुषमा ने कहा कि मेरे सामने दो रास्ते थे। मजदूरी करूं या अपने पति की विरासत संभालूं। लोगों ने डराया। लाशें देख कर डरोगी। नींद नहीं आएगी। समाज क्या कहेगा? अंतत: मैंने घाट का रास्ता चुना। सुषमा 24 गांव के शवों का अंतिम संस्कार कराती हैं। उन्हें रोज घाट आना ही होता है।

कांति को भी जिंदगी घाट पर ले आई
कांति पंडा करीब 20 साल पहले जब ब्याह कर आई थीं, सोहर-बन्ने की गूंज के बीच उनकी डोली उतारी गई थी। लेकिन पिछले 10 साल से इदं न मम… इदं न मम उनकी जिंदगी की धुरी बन गया है। पति रमेश की मौत के बाद वह भी घाट पर अंतिम संस्कार कराती हैं। दाह संस्कार से मिलने वाले पैसों से ही उनका खर्च चलता है। बेटी की शादी हो चुकी है। बेटा नीरज कानपुर में मजदूरी करता है।

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