छत्तीसगढ़ में 9.25 प्रतिशत आबादी सिकल सेल से ग्रसित
रायपुर
सिकल सेल के रोगियों की संख्या के मामले में विश्व में भारत दूसरे नंबर पर है और यह रोग सबसे ज्यादा मध्य भारत पर हावी है, जिसे सिकल बेल्ट भी कहा जाता है। यह गुजरात से लेकर ओडिशा तक फैला है और आकलन के अनुसार, छत्तीसगढ़, बिहार और उत्तर प्रदेश में इसकी सबसे ज्यादा व्यापकता है। वहीं छत्तीसगढ़ में 9.25 प्रतिशत आबादी सिकल सेल से ग्रसित हैं। राज्य सरकार ने सिकल सेल वारियर्स की मदद से इस पर रोग पर नियंत्रण पाने के लिए बेहतर प्रयास कर रही हैं।
रायपुर मेडिकल कॉलेज में पैथोलॉजी के प्रोफेसर डॉ. अरविंद नेरल ने कहा कि छत्तीसगढ़ में कम से कम 9.25 प्रतिशत आबादी में सिकल सेल जीन है, जबकि कुल मिलाकर इस रोग की सूचित व्यापकता लगभग 0.8 प्रतिशत से 0.9 प्रतिशत के बीच है। इस रोग को कई चिंताजनक परेशानियों से जोड़कर देखा जाता है, सिकल सेल से पीड़ित 6 प्रतिशत बच्चे अपने जन्म के 1 वर्ष के भीतर मर जाते हैं और उनमें से अधिकांश बच्चे 20 से 21 वर्ष की आयु को पार नहीं कर पाते हैं। इसकी रोकथाम के लिये, विवाह-पूर्व परामर्श और जाँच एक प्रभावी कदम हो सकता है। इस रोग से पैदा होने वाली परेशानियों की रोकथाम या निदान और रोगी के जीवन की गुणवत्ता में सहयोग देने के लक्ष्य से जीनेटिक इंजीनियरिंग पर शोध भी चल रहा है। आगे बढ?े और सार्वजनिक स्वास्थ्य के इस संकट से निपटने के लिये पुनर्वास के उपाय अत्यावश्यक हैं। सरकार ने छत्तीसगढ़ में अपनी सिकल सेल वारियर्स पहल के साथ मजबूत कार्यवाही की है, ताकि इस रोग पर नियंत्रण और स्वास्थ्यरक्षा अवसंरचना बेहतर हों। विगत कुछ वर्षों में, इस सहयोग ने हमें सिकल सेल रोग के लिये एक स्वायत्त निकाय की स्थापना करने में सक्षम बनाया है, ताकि हम परामर्श से लेकर जांच, प्रशिक्षण और शोध तक चिकित्सकीय सहयोग तक लोगों की पहुंच को बढ़ा सके। इसके आगे, सरकार को इस क्षेत्र में उन्नत उपचार तक लोगों की पहुंच बढ़ाने के लिये भी सहयोग देना चाहिये।
नेशनल अलायंस आॅफ सिकल सेल आॅगेर्नाइजेशंस (एनएएससीओ) के मेम्बर सेक्रेटरी गौतम डोंगरे सिकल सेल के 2 रोगियों के पिता हैं। उनके अनुसार भारत में सिकल सेल डिजीज (एससीडी) कम्युनिटी के लिये कोई पॉलिसी बनाने और क्रियान्वित करने में रोगी और उसकी देखभाल करने वालों की बात का समावेश जरूरी है। हमारा मिशन यह सुनिश्चित करना है कि भारत में सिकल सेल डिजीज से लड?े वाला हर व्यक्ति दर्द से मुक्त जीवन जीये और उसे सभी स्वास्थ्यसेवा केन्द्रों में सही समय पर व्यापक गुणवत्तापूर्ण देखभाल और उपचार मिले।
एससीडी का आशय लाल रक्त कणिकाओं के वंशानुगत रोगों के एक समूह से है। इसके लक्षण हैं बार-बार दुर्बल बनाने वाला दर्द, जिसे वैसो-आॅक्लुसिव क्राइसेस (वीओसी) भी कहा जाता है और बुखार। सिकल सेल के रोगियों को होने वाले वीओसी को ज्यादा समय तक अस्पताल में भर्ती रहने और अस्वस्थता से भी जोड़कर देखा जाता है। लंबी अवधि में इससे उत्पन्न होने वाली जटिलताओं में से कुछ हैं – अंगों की क्षति, किडनी का पुराना रोग और कार्यात्मक अक्षमता। इसके अलावा, एससीडी के रोगी संक्रमण, आघात, एक्युट चेस्ट सिंड्रोम, थकान और पैर में छाले के लिये भी ज्यादा संवेदनशील होते हैं। रोग की पहचान और उपचार में विलंब होने से यह समस्याएं बढ़ सकती हैं। इसलिये इसका पता लगाने, उपचार करने और इसके लिये नवाचार को अपनाने में प्रगति धीमी रही है। एससीडी को सार्वजनिक स्वास्थ्य की प्राथमिकता के तौर पर चिन्हित करने के लिये एक राष्ट्रीय कार्यक्रम, देखभाल की एक व्यापक योजना और भारत के लिये उपचार के विशेष प्रोटोकॉल्स बनाने की जरूरत है, जिन्हें जमीनी स्तर पर क्षमता निर्माण से सहयोग मिले, ताकि राज्य अपनी जनसांख्यिकी की विशिष्ट आवश्यकताओं को पूरा करने वाली स्थानीय योजनाएं दे सकें।
