कोविड संक्रमण से ठीक होने के बाद अन्य कोविड संक्रमित जरूरतमंदो को मदद पहुंचाकर दूसरों के लिए मिसाल बने पति पत्नी

रायपुर
वर्षा झा एक दशक से भी ज्यादा समय तक छत्तीसगढ़ के दुर्गम क्षेत्र बस्तर में सक्रिय रूप से कार्यरत रहीं हैं। पिछले दिनों अग्यात कारणों से उन्होंने अपनी नौकरी से इस्तीफा देकर कुछ समय तक जरूरत मंदो की मदद करने का संकल्प लिया था। उन्हें करीब से जानने वाले लोगों के मुताबिक वर्षा झा एवं उनके पति पवन झा दोनों ही पति पत्नी कोरोना संक्रमित हो गए थे और इसी दौरान उनको हुई विभिन्न परेशानियों के मद्देनजर दोनों ने पोस्ट कोविड कुछ समय तक जरूरत मंदो को मदद करने का निश्चय किया। प्राप्त जानकारी के अनुसार वर्षा झा जब रात में अपने कोविड संक्रमित पति को अस्पताल में भर्ती कराकर घर लौट रही थी तो उन्हें मेन ट्रैफिक सिग्नल के पास एक हताश व्यक्ति दिखाई पड़ा।

पूछताछ करने से पता चला कि वह वह बस्तर के अंदरूनी गांव से रायपुर के एक स्थानीय होटल में काम करने आया था। लेकिन कोरोना के चलते होटल बंद होने के कारण उसका रहने और खाने का इंतजाम भी बंद हो गया। वह इधर उधर भटकते हुए किसी तरह अपने खाने की व्यवस्था करके रात मे कहीं भी शेल्टर मे सो जाता था। इसी बीच उसे कोविड संक्रमण हो गया और एक रिक्शेवाले ने उसे अंबेडकर अस्पताल रायपुर मे भर्ती करवाया। वहां सफलतापूर्वक उसका कोविड का इलाज होने के बाद उसे वहां से छुट्टी दे दी गई लेकिन बहुत ज्यादा कमजोरी और पैसे की कमी के कारण वह घर नहीं जा पा रहा था। डिस्चार्ज होने के बाद से ही वह ऐसे ही दिशाहीन डर मे घूम रहा है। किसी ने उसे बताया कि तेलीबांधा में उसको किसी संस्था से मदद मिल सकती है इसलिए वह यहाँ आया है लेकिन पिछले कई घंटों से भटकते रहने के बाद भी कोई भी मददगार नहीं मिला। उस व्यक्ति की अवस्था को देखते हुए श्रीमती झा ने आधी रात में ही किसी तरह से न केवल उस व्यक्ति के खाने और रहने की व्यवस्था करवाईं, बल्कि सुबह होने के बाद बस्तर लौटने की व्यवस्था भी करवा दीं। अगले दिन अस्पताल जाने से पहले, श्रीमती झा ने सुनिश्चित किया कि वह व्यक्ति सुरक्षित अपने गांव जा सके।

बस्तर के उक्त व्यक्ति के साथ ही काम करनेवाले झारखंड के एक प्रवासी ग्रामीण को भी श्रीमती झा द्वारा मदद पहुंचाइ गई। इस घटना के बाद भी वह अस्पताल आते जाते जरूरतमंद प्रवासी मजदूरों को देख उनके भोजन, दवा या घर वापस जाने की व्यवस्था करती रहीं.

अस्पताल से डिस्चार्ज होकर घर आ जाने के बाद दोनों पति पत्नी ने फैसला किया कि वे नौकरी की तलाश करने के पहले अगले कुछ दिनों तक वे अपने सामर्थ्य अनुसार पोस्ट कोविडभय से प्रभावित जरूरतमंदों की मदद पहले करेंगे। इसी तरह एक के बाद एक उन्होंने सैकड़ों की तादात मे लोगों को पोस्टकोविड उतपन्न मानसिक तनाव और घबराहट से खुद को बचाने में मदद पहुंचाने का काम किया है। उनके द्वारा मदद प्राप्त लोगों ने अपने जान पहचान अड़ोस पड़ोस मे दोनों दंपति के बारे मे बात करना शुरू किया और उसी माध्यम से ही छत्तीसगढ़ के विभिन्न हिस्सों (बस्तर संभाग से अधिकतम), दिल्ली ऐनसीआर, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, झारखंड, बिहार, मध्यप्रदेश, उड़ीसा जैसे राज्यों के प्रवासी परिवारों ने भी पोस्टकोविड डिप्रैशन से निजात पाने मे इनसे सहायता प्राप्त की ।

इस तरह किसी जरूरतमंद की मदद करने के बाद एक के क्रम मे दोनों ने 400 से भी ज्यादा लोगों की हर संभव मदद की. ज्यादातर लोग पोस्टकोविड ट्रॉमा में थे जिनका मनोवैज्ञानिक परामर्श से ही समस्या का समाधान हो गया। कुछ को डॉक्टर की काउंसलिंग की जरूरत थी, इसलिए उन्हें डॉक्टर से संपर्क स्थापित करवाया गया। इसके साथ ही उन्होंने अपने खर्चे पर हजारों मास्क, सैकड़ों हैंड सैनिटाइजर, रेस्परोमीटर और आॅक्सीमीटर, थमार्मीटर, दवाएं और खाद्य सामग्री जरूरतमंदों को वितरित की। इसके अलावा घरेलू सहायिकाओं, सड़क किनारे फल-सब्जी विक्रेताओं में टीकाकरण के प्रति जागरुकता फैलाकर उन्हें इंजेक्शन लगवाने की व्यवस्था कराने में भी अपना योगदान दिया है। यहां तक की उन्होंने बस्तर और आसपास के क्षेत्रों में कोविड से ठीक हो चुके संपन्न लोगों के पास बची हुई दवाओं को कुछ सरकारी, सामाजिक और गैरसरकारी व्यक्तियों की मदद से इक_ा करवाकर जरूरतमंदों तक भी पहुंचवाया। उन्होंने छत्तीसगढ़ राज्य के कुछ प्रभावशाली लोगों को सलाह भी दी कि बड़े बड़े अपार्टमेंट और संपन्न कालोनियों में एक बड़ा बाक्स रखा जाए ताकि कोविड से ठीक हो चुके लोग बची हुई दवाएं उसमें डालें और फिर वेलफेयर एसोसिएशन या सोसायटी उन दवाओं को सरकारी तंत्र के माध्यम से अक्षम जरूरतमंदो तक पहुंचाएं। हालांकि यह एक कारगर उपाय हो सकता था लेकिन कुछ तकनीकी काम्प्लकेशन के कारण बड़े पैमाने पर कारगर नहीं हो पाया। फिर भी श्रीमती झा के संपर्क के लोगों ने अपने अपने स्तर पर मोल्ड करके लोगों की मदद की है। जो लोग उन्हें करीब से जानते हैं, उनके मुताबिक श्रीमती झा ने बस्तर में टाटा स्टील, एस्सार और एएमएनएसआई कंपनी तथा इलाके के लोगों के प्रति अपनी भूमिका भी बखूबी निभाई है, जिसका सबूत बस्तर के लोगों के बीच आज भी आसानी से मिल जाएगा।

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