जलवायु परिवर्तन से लुप्त हो सकते हैं कस्तूरी हिरण और हिम तेंदुए

नई दिल्ली
यदि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन इसी रफ्तार से जारी रहा तो प्रकृति के कई अजूबे भी लुप्त हो सकते हैं। इनमें दुर्लभ वनस्पतियां एवं जानवर शामिल हैं। बायोलॉजिकल कंजर्वेशन जर्नल में प्रकाशित एक शोध में यह दावा किया गया है।  वैज्ञानिकों की एक वैश्विक टीम ने लगभग 300 बायोडायवर्सिटी हॉटस्पॉट का विश्लेषण किया है। यह विश्लेषण जानवरों और पौधों की प्रजातियों की असाधारण उच्च संख्या वाले स्थानों पर किया गया। इनमें से कई हॉटस्पॉट लुप्तप्राय प्रजातियों के हैं जो एक भौगोलिक स्थान जैसे एक द्वीप या एक देश के लिए ख़ास या विशेष रूप से अद्वितीय हैं। रिपोर्ट के अनुसार, एशिया में हिंद महासागर द्वीप समूह, फिलीपींस और श्रीलंका सहित पश्चिमी घाट के पहाड़ 2050 तक जलवायु परिवर्तन के कारण अपने अधिकांश स्थानिक पौधों को खो सकते हैं। ऐसे खतरे वाले जीवों में फारसी पैंथर, बलूचिस्तान काला भालू और हिम तेंदुआ, कस्तूरी मृग भी शामिल हैं। कई अन्य हिमालयी प्रजातियों को भी खतरा है। जैसे औषधीय लाइकेन लोबारिया पिंडारेंसिस के अस्तित्व के लिए भी चुनौती है। शोध में कहा गया है कि मौजूदा गतिविधियां सदी के अंत तक तापमान बढ़ोत्तरी को तीन डिग्री की ओर ले जा रही हैं। ऐसी स्थिति में जमीन पर रहने वाली एक तिहाई और समुद्र में रहने वाली आधी प्रजातियां लुप्त हो जाएंगी। पहाड़ों पर 84 फीसदी स्थानी जानवरों और पौधों को के समक्ष लुप्त होने का संकट पैदा होगा। जबकि द्वीपों पर यह खतरा सौ फीसदी होगा। शोध के अनुसार तीन डिग्री तापमान बढ़ने से 92 फीसदी स्थानिक तथा 95 फीसदी समुद्री प्रजातियों को नकारात्मक परिणामों का सामना करना पड़ेगा।

शोध के परिणाम बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन सबसे मूल और स्थानिक प्रजातियों को नकारात्मक रूप से प्रभावित करेगा। यदि देश पेरिस समझौते के अनुरूप उत्सर्जन को कम करते हैं तो यह खतरा काफी हद तक टल सकता है। यदि तापमान बढ़ोत्तरी डेढ़ डिग्री से नीचे रहती है तो दो फीसदी प्रजातियों के लिए ही खतरा पैदा होगा। यदि बढ़ोत्तरी दो डिग्री की रहती है तो चार फीसदी प्रजातियां के लुप्त होने का खतरा रहेगा। शोध में कहा गया है कि यदि ग्लास्गो में पेरिस समझौते के तहत तापमान बढ़ोत्तरी को डेढ़ डिग्री रखने के प्रयासों पर सहमति बनती है तो प्राकृतिक खजाने को बिनास से बचाया जा सकता है।

 

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