मुखिया को पद से हटाने के प्रधान सचिव के आदेश को रद्द कर हाईकोर्ट ने दिया ये अहम फैसला
पटना
बिहार में मुखिया और उप मुखिया को पद से हटाने के पूर्व लोक प्रहरी की अनुशंसा जरूरी होगी। बगैर अनुशंसा के हटाना गैर कानूनी होगा। पटना हाईकोर्ट ने सोमवार को अपने एक अहम फैसला में पंचायती राज कानून का हवाला देते हुये कहा कि पंचायती राज कानून में लोक प्रहरी की भूमिका होने के बावजूद आज तक इस संस्था का गठन नहीं किया गया और आज भी पंचायतों में बगैर लोक प्रहरी की अनुशंसा के मुखिया पर कार्रवाई की जाती रही है। न्यायमूर्ति डॉ. अनिल कुमार उपाध्याय की एकलपीठ ने कौशल राय की ओर से दायर रिट याचिका पर सुनवाई के बाद यह फैसला दिया।
कोर्ट को बताया गया कि ‘पद के दुरुपयोग’ के आरोप में पंचायती राज विभाग के प्रधान सचिव ने मुखिया को हटाने का आदेश दिया था, लेकिन पद से हटाने के पूर्व लोक प्रहरी से अनुशंसा नहीं की गयी, जबकि पंचायती राज कानून की धारा 18 में संशोधन कर मुखिया व उप मुखिया, प्रमुख को हटाने के पूर्व लोक प्रहरी की अनुशंसा लेने का प्रावधान जोड़ा गया है। यह संशोधन एक दशक पूर्व ही पंचायती राज कानून में किया गया, लेकिन इस नये प्रावधान के तहत अब तक लोक प्रहरी संस्था का गठन ही नहीं किया गया और राज्य सरकार के अधिकारी लोक प्रहरी की शक्तियों का अपने ही स्तर से इस्तेमाल कर कार्रवाई कर रहे हैं।
याचिकाकर्ता ने इस तरह की कार्रवाई को गैर कानूनी बताया। उनका कहना था कि सीतामढ़ी के ही डुमरी प्रखंड के बरियारपुर ग्राम पंचायत के मुखिया पर उनके मुवक्किल से ज्यादा गम्भीर आरोप होने के बावजूद उन्हें केवल चेतावनी देकर छोड़ दिया गया, जबकि आवेदक को पद से हटाने का आदेश जारी किया गया। लोक प्रहरी जैसी संस्था के नहीं होने के कारण अधिकारी मनमानी करते हैं। कोर्ट ने आवेदक की अर्जी को मंज़ूर करते हुए प्रधान सचिव के आदेश को निरस्त कर दिया।
