आपकी भूल,अवाम को भाला

भोपाल

एक गाना है, 79 के आसपास की जनता हवलदार फिल्म का "हमसे का भूल भई, जो ये सज़ा हमका मिली "। आज की शुरुआत इसी से क्योंकि आज दो गाने एक साथ याद आ रहे हैं और गानों की बात होगी तो गलियों में भी जाएगी। गलियों में जाएगी तो सरकार तक भी आएगी। सरकारों और जिम्मेदारों से भूल हो जाने का चलन बहुत पुराना है लेकिन इस वक्त ऐसा लगता है कि भूल का सीज़न चल रहा है । 

उदाहरण बहुतेरे हैं लेकिन इस वक्त सिर्फ 2 की बात, पहला मामला केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से जुड़ा हुआ । पहले खबर आई कि छोटी बचत योजनाओं की ब्याज दर घटाई जा रही हैं, 24 घंटे के अंदर अंदर खुद वित्त मंत्री ने ट्वीट कर कहा कि भूल हो गई थी। ब्याज दरें नहीं घटाई जा रही है।मतलब फैसला वापस। अगला मामला इंदौर का जहां अलग अलग कर बढ़ाने का फैसला लिया गया। फैसला लेने के बाद से ही आम लोग सोशल मीडिया पर नाराज़गी जताने लगे तो बीजेपी-कांग्रेस नेताओं ने भी विरोध करना शुरु कर दिया। कुछ घंटों बाद इलाके के कद्दावर नेता और मंत्री तुलसी सिलावट मीडिया के सामने आए और कहा कि जनभावनाओं को ध्यान में रखते हुए फैसला वापस ले लिया गया है। उन्होंने लगभग सारे नेताओं के नाम गिनाए और कहा कि इन सभी ने सीएम शिवराज से फैसला वापस लेने की अपील की और फैसला वापस हुआ। 

सवाल तो ये कि जब सारे दिग्गज फैसला वापस करवाने पर तुले हैं तो फैसला हो कैसे गया, किसने कर लिया। अगर अफसरों का दोष है तो नेताओं की जरूरत क्या। दूसरा कि जनभावनाएं फैसले के पहले क्यों नहीं दिखती हैं। इतने नेताओं को अगर जनभावनाएं नहीं दिखी तो नेता कैसे। इन दो फैसलों के अलावा भी लंबी फेहरिस्त है जो मजबूर करती है कि एक खास 'क्रोनोलॉजी' पर सोचने के लिए, और वो है कि विरोध हुआ तो वापस ले लेंगे वरना राष्ट्र निर्माण में 'जबरन योगदान' मान लिया जाएगा । 

कुल जमा भूल हो या भावनाएं हों, शब्दों के फेर में गलती तो नहीं छिपाई जा सकती। अब ज़रा दूसरे गाने की बात, ये फिल्म भी साल 79 की ही है नाम है शिक्षा जिसमें गायक यशुदास की आवाज़ में एक गाना है "तेरी छोटी सी एक भूल ने सारा, गुलशन जला दिया "। मुखड़े के बाद की लाइने हैं, "जाने कहाँ की रीत है ये, कोई करे और कोई भरे। न्याय नहीं अन्याय है ये, दोषी जिए, निर्दोष मरे।"

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