प्रदेश में आयुष के क्षेत्र में निरंतर अनुसंधान एवं शोध की जरूरत
भोपाल
प्रदेश के जनजातीय क्षेत्रों में प्राचीन चिकित्सा पद्धति की लम्बी परम्परा रही है। प्राचीन चिकित्सा पद्धति में उपयोग में लाई जाने वाली वनौषधि में अभी भी निरंतर शोध किये जाने की जरूरत है। साथ ही इन्हें राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रमाणीकरण दिलाये जाने की भी आवश्यकता है। इसके लिये जरूरी है कि युवा आयुष के क्षेत्र में प्रभावी अनुसंधान करें। उनके अनुसंधान में राज्य सरकार की ओर से किस तरह मदद की जा सकती है, इसी मकसद से पीएच.डी. कोलोक्वियम का आयोजन किया गया है। यह विचार आज आरसीव्हीपी नरोन्हा प्रशासन अकादमी में अटल बिहारी वाजपेयी सुशासन संस्थान के सलाहकार डॉ. अभिषेक भगत ने व्यक्त किये।
संगोष्ठी में प्रदेश के विभिन्न महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों से जुड़े रिसर्च स्कॉलर्स ने अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किये। शोध-पत्र में प्रमुख रूप से ओरल कैंसर, प्लास्टिक के अत्यधिक उपयोग के कारण होने वाले दुष्प्रभाव, निमोनिया में हर्बल औषधि के उपयोग जैसे विषयों की प्रस्तुति दी गई।
विषय-विशेषज्ञों ने बताया कि कोरोना काल में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिये आयुर्वेद औषधियों का जन-सामान्य ने अधिक से अधिक उपयोग किया। विशेषज्ञों का कहना था कि आयुष पद्धति की औषधियों के निरंतर प्रयोग के बावजूद इसके कोई साइड इफेक्ट शरीर पर नहीं पड़ते हैं। संगोष्ठी में अध्यक्ष के रूप में आरजीपीव्ही कॉलेज की डॉ. दीप्ति जैन, स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी डॉ. रूबी खान, रवीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय की डॉ. प्रज्ञा श्रीवास्तव ने शोधकर्ताओं को उनके रिसर्च पेपर पर महत्वपूर्ण सुझाव दिये।
