नूतन वर्ष में विकास के शाश्वत संकल्प की पुनरावृत्ति और क्रियान्वयन का प्रण

भोपाल

प्रकृति के सात्विक समन्वय से संयुक्त युगाब्द के इस नूतन भारतीय नव वर्ष पर आप सबकोअन्तर्मन से असीम शुभकामनाएं समर्पित करता हूं और यह कामना करता हूं कि यह वर्ष हम सब के लिए विकास तथा प्रगति की नई परिभाषाएं स्थापित करे।

ओमकार के दिव्य नाद से प्रारंभ हुई सृष्टि का यह कालचक्र गणना की दृष्टि से अलग-अलग संवत् के रूप में अभिव्यक्त हुआ। सौर चंद्र, नक्षत्र, सावन और अधिमास के संवत्सरों में से सभी को समाहित करने वाले इस नूतन संवत्सर की स्थापना महाराजा विक्रमादित्य ने की थी। तदनुसार आज से विक्रम संवत प्रारंभ हुआ। ब्रह्माजी द्वारा सृष्टि स्थापना, सतयुग के प्रारंभ, भगवान विष्णु का मत्स्य रूप में अवतार ग्रहण, आदि शक्ति के पूजन का प्रथम दिन जैसे पावन प्रसंगों को स्मरण कराने वाले चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के इस मांगलिक त्यौहार को पूरे देश में अलग-अलग नामों से समारोहित किया जाता है। देश की भौगोलिक सीमाओं में स्वयं प्रकृति भी अपने नवपल्लवों से इस पर्व पर वंदनवार सजाती है। खेतों में बिखरा हुआ अन्न, पक्षियों का कलरव, ऋतु परिवर्तन, उत्तरी गोलार्ध में प्रकाश की अवधि में वृद्धि जैसे अनेक प्राकृतिक संकेत इस पावन पर्व के लिए मानो मंगल गीत गाते हैं। भारत शब्द में ‘भा’ का अर्थ है प्रकाश और ‘रत’ का अर्थ है- लगा हुआ। हमारा देश प्रकाश की खोज में, प्रकाश के विकास में और अंधकार को पराजित करने में लगा हुआ है। इसलिए प्रकाश की अभिवृद्धि का यह पर्व प्रकृति की नवचेतना के साथ समारोहित होता है और पूरे देश में सांस्कृतिक एकता को फिर से रेखांकित करता है।

प्रकाश की खोज और विकास हमारे लिए केवल शब्द पुष्प नहीं हैं, अपितु यह अपने शुभ संकल्पों के शाश्वत क्रियान्वयन और उसकी सफल परिणिति का मंगल गान भी हैं। इसलिए वर्ष प्रतिपदा से केवल तीन दिन पूर्व 20 मार्च को हमारा एक महत्वपूर्ण संकल्प साकार हुआ। इस दिन प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण के पाँच लाख से अधिक लोगों के गृहप्रवेश उत्सव पर माननीय प्रधानमंत्री जी श्री नरेन्द्र मोदीजी ने अमृत सरोवर बनाने का संकल्प देकर हम सब को प्रकृति से और भी अधिक तादात्म्य स्थापित करते हुए नवनिर्माण करने और विकास के अनंत द्वार खोलने की प्रेरणा दी। जल, जमीन और आवास से जुड़ा हुआ यह समारोह मानो वर्ष प्रतिपदा के आगमन के पूर्व स्वागत का तोरण द्वार सजाने जैसा मंगलकारी है। प्रदेश के सेवक के रूप में इस अवसर पर मैं आपको आश्वस्त करता हूँ कि प्रदेश के विकास और पर्यावरण के संरक्षण की समन्वित संभावना को एक वर्ष में अपने संकल्प से पूर्ण करने का हरसंभव प्रयास करूंगा और मुझे विश्वास है कि आप सबके सहयोग से यह संभव भी होगा।

भारत ही वह देश है, जिसने वेदों में पृथ्वी सूक्त में सर्वप्रथम ‘माता पृथ्वी, पुत्रो अहम पृथ्व्यिा’ का मंत्र गुंजायमान कर प्रकृति और मनुष्य के बीच में माता और पुत्र का संबंध स्थापित किया है।

हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री जी ने भी इसी सनातन परंपरा के क्रम में हमें प्रकृति को समृद्ध और पुष्ट करने के लिए संकल्पित होने का आह्वान किया है, जिसके अनुसार हमें इस वर्ष प्रतिपदा से आगामी वर्ष प्रतिपदा के बीच 75 अमृत सरोवरों का निर्माण करना है। प्रकृति के कण-कण में दिव्य चेतना का दर्शन कराने वाली भारतीय परंपरा में इस प्रकार के सरोवरों का निर्माण प्रकृति के विकास के लिए ही है, जिसकी विशाल गोद में मनुष्य ही नहीं अपितु जीव-जंतु, पेड़, पौधे, नदी, जल, आकाश पर्वत सभी आश्रय पाते हैं। माननीय प्रधानमंत्री जी के द्वारा दिए गए इस प्रेरक संकल्प से प्राकृतिक पर्यावरण संतुलित तो होगा ही, साथ ही स्वच्छ जल, हर खेत को पानी, फसल उत्पादन में वृद्धि, रोजगार का विकास और प्रकृति की गोद में नए वन एवं उपवनों से श्रृंगार भी संभव हो सकेगा।

इसी प्रसंग में मैं यह निवेदन करना चाहता हूं कि प्रदेश की धरती का प्रत्येक कोना हरियाली से समृद्ध रहे, इस भावना से मैंने प्रतिदिन एक पौधा लगाने का संकल्प लिया है और यह कार्य आपके सहयोग से लगातार चल रहा है। प्रदेश के जनमानस को पौधा रोपण से जोड़ने लिए अंकुर अभियान प्रारंभ किया गया और मुझे यह कहते हुए विशेष प्रसन्नता है कि आप सब प्रदेशवासियों ने इस अभियान को जन अभियान बना दिया है।

भारतीय परंपरा जहाँ ‘संगच्छध्वंसंवदध्वं’ की बात कहकर साथ जीने का संदेश देती है, वहीं ‘यावत्भूमण्डलंधत्ते, सशैलवनकाननं’ कहकर पौधों और प्रकृति के साथ जीवनयापन का दर्शन भी सिखाती है। आर्थिक प्रगति और औद्योगीकरण से भरे हुए इस युग में माननीय प्रधानमंत्रीजी ने पर्यावरण के प्रति टूटी हुई संवेदन श्रृंखला को पुनर्जीवित करने के लिए ही हमें प्रकृति रक्षा का संकल्प दिलाया है।

भारतीय चिंतकों, मनीषियों और विचारकों की लोकोपकारी जीवनशैली के अनुरूप ही मैंने अपना जीवन जन-कल्याण को समर्पित किया है। अपने संपूर्ण कार्यकाल में मैं प्रतिक्षण प्रदेशवासियों के कल्याण के लिए समर्पित रहा हूं और रहूंगा। इस शुभ संकल्प में आपके पूर्ण सहयोग से प्रदेश में विकास की नवसरिता प्रवाहित हुई है। इसी के कारण आज प्रदेश बीमारू राज्यों की श्रेणी से बाहर निकल आया है। इसके पीछे मूल कारण यही रहा कि जनकल्याण की सभी योजनाएं जनता के बीच बैठकर बनाई गईं और जनभागीदारी से उनका क्रियान्वयन भी संभव हुआ। प्रदेश के समर्पित मेडिकल स्टाफ, पुलिस प्रशासन के अधिकारियों, सफाईकर्मियों सहित समस्त जनता की सहभागिता से ही हम ‘कोरोना’ को नियंत्रित करने में सफल हुए, जिसमें हमें माननीय प्रधानमंत्री जी का पूर्ण मार्गदर्शन और सतत् सहयोग प्राप्त हुआ। मैं आश्वस्त हूं कि हम प्रधानमंत्री जी के आत्मनिर्भर भारत के संकल्प में सहभागी होकर आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश का निर्माण करेंगे। आज नवसंवत्सर हमें यह संकल्प लेने की भी प्रेरणा देता है कि हम स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव को प्राकृतिक संरक्षण के साथ विकास का अमृत महोत्सव बनाएंगे।

आज के सूर्योदय से प्रारंभ होने वाला नववर्ष हमारी अनंत युगीन परंपरा का पवित्र प्रतीक है। यह हमारी सतत्प्रवाहमान सांस्कृतिक सरिता का सुमधुर निनाद है, जो हमें प्रगति पथ पर नवीन संचालन हेतु प्रेरित करता है। आइए, हम सब मिलकर प्रकृति के साथ ताल-मेल रखते हुए आत्मनिर्भर प्रदेश के निर्माण का संकल्प लें। ‘तन समर्पित, मन समर्पित, आयु का क्षण-क्षण समर्पित’ के संकल्प के साथ मैं प्रदेश की सेवा के लिए सदैव तत्पर हूं और मध्यप्रदेशरूपी इस विराट मंदिर में विराजित जनता रूपी जनार्दन की सेवा करते हुए स्वयं को गौरवान्वित समझता हूं तथा इस नूतन वर्ष पर आपकी सेवा के नए आयाम स्थापित करने के लिए अविराम प्रयत्न करने हेतु अपने संकल्प की पुनरावृत्ति करता हूं।

राम काज कीन्हे बिनु मोहि कहां विश्राम
जय हिंद – जय मध्यप्रदेश।

 

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