सोशल मीडिया पर पोस्ट कहीं नौकरी में अड़ंगा ना बन जाए

नई दिल्ली

भारत में कंपनियां अब नौकरी मांगने वाले कर्मचारियों की सोशल मीडिया प्रोफाइल की गहनता से पड़ताल कर रही हैं. राजनीतिक मुद्दों पर सक्रिय रहने वाले कर्मचारियों की नौकरी पाने की संभावनाओं पर भी इसका असर पड़ने लगा है.हरीश (बदला हुआ नाम) जब दिल्ली के पास नोएडा में सिनेमाघरों के टिकट ऑनलाइन बुक करने की सुविधा देने वाली कंपनी के लिए काम करते थे तो वह अपने राजनीतिक विचार सोशल मीडिया साइट फेसबुक पर साझा करते थे. अपने विचारों को लेकर अपने सहकर्मियों से बहस तक करते, जो कि अक्सर सरकार विरोधी (केंद्र में बीजेपी सरकार) होते थे. खाने की मेज हो या फिर चाय ब्रेक, हरीश और उनके सहकर्मियों के बीच सरकार की नीतियों को लेकर लंबी बहस होती. लेकिन हरीश को एक दिन यह ख्याल आया कि कहीं यह बहसबाजी उनके करियर के लिए नकारात्मक ना हो जाए. हरीश कहते हैं, "मैंने इस बात पर तब और गंभीरता से विचार किया जब मेरी बेटी पैदा हुई. मैंने सोचा क्या मेरे पोस्ट से कहीं मेरा करियर दांव पर तो नहीं लग रहा है. कहीं मेरे प्रति दफ्तर के लोगों में अलग सोच तो नहीं पैदा हो रही है.

कहीं मैं समस्या पैदा करने वालों के रूप में जाने अनजाने में तो नहीं जाना जा रहा हूं" पाकिस्तान में सोशल मीडिया पर सेना, अदालत की आलोचना पर कड़ी सजा हरीश कुछ साल पहले दिल्ली से बेंगलुरू चले गए और उन्होंने सोशल मीडिया पर राजनीतिक मुद्दों पर टिप्पणी ही करना बंद कर दिया. बेटी पैदा होने से पहले तक वह महंगाई, सरकार की नीतियों और अहम राजनीतिक मुद्दों पर अपने विचार साझा करते थे. इस तरह से उनके सहकर्मियों और उनके बीच एक राजनीतिक लकीर भी खिंच गई. हरीश कहते हैं, "पहले की बात अलग थी, अब मेरी बेटी है और जॉब मार्केट में उतनी नौकरियां नहीं हैं. मैं किसी तरह का भी जोखिम नहीं उठाना चाहता" सोशल मीडिया पोस्ट से परहेज भारत में अब नौकरी करने वाला एक तबका राजनीतिक और धार्मिक मुद्दों पर खुलेआम सोशल मीडिया पर टिप्पणी करने से बच रहे हैं. खासकर सत्ताधारी दल बीजेपी के खिलाफ. सिर्फ यही नहीं बल्कि कंपनियां अपने कर्मचारियों के सोशल मीडिया खाते को लिंक्डिन खाते से मिलाती हैं, यह जानने के लिए कहीं कर्मचारी अपनी नौकरी को लेकर सोशल मीडिया पर डींग तो नहीं मार रहा है. हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच सोशल मीडिया की वजह से कट्टरता में वृद्धि! सिंपली एचआर सॉल्यूशंस के मैनेजिंग पार्टनर रजनीश सिंह कहते हैं कि सोशल मीडिया तेजी से एक ऐसा स्थान बनता जा रहा है जहां भर्ती के फैसले पर पहुंचने के दौरान व्यक्ति के द्वारा पोस्ट की गई सामग्री पर ध्यान दिया जाता है.

वह बताते हैं कि कुछ कंपनियों के पास अब उनके एचआर मैनुअल के हिस्से के रूप में सोशल मीडिया पॉलिसी है. सिंह के मुताबिक, "सोशल मीडिया पॉलिसी स्पष्ट रूप से बताती है कि अगर किसी कर्मचारी द्वारा विशेष रूप से कंपनी का नाम लेते हुए पोस्ट साझा किए गए तो उसे गंभीरता से लिया जाएगा" ट्विटर से कॉन्टेंट हटवाने में भारत सरकार पांचवें नंबर पर साथ ही सिंह कहते हैं कि अगर कोई व्यक्ति निजी क्षमता में पोस्ट कर रहा है तो उसे गंभीरता से नहीं लिया जाएगा लेकिन कंपनी के बारे में नकारात्मक बातें पोस्ट करना स्पष्ट रूप से एक कदाचार के रूप में देखा जाता है. सिंह के मुताबिक, "ऐसे मामले सामने आए हैं जहां कर्मचारियों को इस तरह के कदाचार के लिए बर्खास्त तक कर दिया गया है" बढ़ रहे हैं मामले 2019 में मैकफी द्वारा किए 1,000 लोगों पर सर्वे में यह तथ्य सामने आया था 21 प्रतिशत भारतीय किसी ऐसे व्यक्ति को जानते थे जिनके करियर की संभावनाओं पर उनके सोशल मीडिया पोस्ट से नकारात्मक प्रभाव पड़ा था. वहीं 25.7 प्रतिशत भारतीयों ने अपने वर्तमान कार्यस्थल के बारे में नकारात्मक सामग्री पोस्ट करने की बात स्वीकार की. 21 प्रतिशत भारतीयों को डर था कि उनकी सोशल मीडिया सामग्री उनके करियर की संभावनाओं को नकारात्मक रूप से प्रभावित करेगी. एक पहलू यह भी है कि सोशल मीडिया ही सरकारों पर दबाव बनाने का काम करती है. भ्रष्टाचार, सरकार की नाकामी जैसे मामले जब सोशल मीडिया पर आते हैं तो जाहिर तौर पर दबाव बनता है. बेरोजगारी जैसे मुद्दे पर भारत के युवा ट्विटर पर सवाल करते हैं और उसे ट्रेंड भी कराने में सफल रहते हैं.

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