6 साल से कॉलेजों की फाइलों में उलझे, नहीं बन पा रही हैं जन भागीदारी समितियां
भोपाल
लगभग 6 साल से सरकार ने कॉलेजों में जनभागीदारी समितियों का गठन नहीं किया है। इसके चलते समिति के तहत होने वाले कामों का दायित्व क्षेत्र के एडीएम और एसडीएम पर आ गया है। यह अफसर भी इसे बोझ ही समझते हैं।
राजधानी के एडीएम और एसडीएम एक दर्जन कॉलेजों की फाइलों में उलझकर रह गए हैं। उन्हें जिला प्रशासन का बोझ वैसे ही सता रहा है। लगातार छह साल से कॉलेजों की समस्याओं से अपना सिरदर्द बढ़ा रहे हैं। उच्च शिक्षा विभाग 6 साल में भोपाल में एक भी जनभागीदारी समिति का अध्यक्ष नियुक्त नहीं कर सका है। बताया जा रहा है कि इस काम के कारण प्रशासनिक अफसर खासे परेशान हो रहे हैं।
छह साल से अटका है मामला…
सन 2016 से जनभागदीारी समितियों का कार्यकाल खत्म होने के बाद भोपाल के एक दर्जन कॉलेजों का प्रभार एडीएम और एसडीएम पर आ गया है। कलेक्टर के आदेश के तहत उन्हें कालेजों की बैठकों में जाकर अपनी अभिमत देने के साथ दिशा निर्देश तक देना होता है। वे कालेज नहीं पहुंच पाते हैं। फाइलें उनका रास्ता तलाशते हुये स्वयं एसडीएम और एडीएम तक पहुंच जाती हैं। इससे वे तंग आ चुके हैं। एक-दो बार कलेक्टर से एसडीएम और एडीएम ने कालेज के बंधन से मुक्त होने की चर्चा भी, लेकिन उच्च शिक्षा विभाग के आदेश के आगे सभी बौने साबित हो रहे हैं।
तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने उठाया था कदम
करीब ढाई साल पहले तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने इस संबंध में आदेश जारी करते हुए प्रदेश के कई कॉलेजों में जनभागीदारी अध्यक्षों की नियुक्तियां की थी। इस पर जनप्रतिनिधियों में खूब आपसी मनमुटाव भी हुए थे। इसके बाद सरकार बदलने के कुछ महीने बाद ही भाजपा सरकार ने सभी नियुक्तियां निरस्त कर दी थी। जब से अब तक यह व्यवस्था प्रशासिनक अधिकारियों के पास है।
