रूस-यूक्रेन वार से महंगाई बढ़ेगी बेशुमार, पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने को मजबूर होंगी कंपनियां

नई दिल्ली
आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ और पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग के मुताबिक यूक्रेन संकट का भारत पर तात्कालिक असर कच्चे तेल के ऊंचे दामों पर देखने को मिल सकता है। कच्चे तेल के दाम बढ़ेंगे तो उससे तेल कंपनियों का घाटा बढ़ता जाएगा और आने वाले दिनों में वो पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने को मजबूर हो जाएंगी। एक बार ये दाम बढ़े तो उसका असर बढ़ती महंगाई के तौर पर चौतरफा देखने को मिलेगा। पेट्रोल के दाम बढ़ने का असर व्यक्तिगत तौर पर गाड़ी इस्तेमाल करने वालों पर ही पड़ेगा। वहीं डीजल के दाम ट्रांसपोर्टेशन को महंगा बनाएंगे। इससे हर उस चीज के दाम में इजाफा होना तय है, जिनके उत्पादन के कच्चे माल को और फिर अंतिम उत्पाद की डिलिवरी में ट्रांसपोर्टेशन का इस्तेमाल होता है। यानि तकरीबन हर तरफ इसका असर दिख सकता है।
 

भारत अपनी तेल जरूरतों के अधिकांश हिस्से के लिए आयात पर ही निर्भर रहता है। तेल की बढ़ी कीमतें भारतीय अर्थव्यवस्था को काफी प्रभावित कर सकती हैं। भारत का आयात बिल भी बढ़ जाएगा जो देश के आर्थिक हालात पर भी आसर डालेगा।साथ ही यूक्रेन से नेचुरल गैस का आयात भी होता है। वहां पर संकट की वजह से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इनके भी दाम बढ़ रहे हैं जो आने वाले दिनों में ग्राहकों के ऊपर गैस के ऊंचे दामों के तौर पर एक बड़ा बोझ हो सकते हैं। इसके अलावा भारतीय छात्र वहां रहकर पढ़ाई करते हैं तो उनपर सीधे तौर पर वहां रहना संकट से भरा रहने वाला है और अगर वो लौटते हैं तो अतिरिक्त टिकट का खर्चा और युद्ध के हालात में पढ़ाई की अनिश्चितता भी उनकी जेब पर भारी पड़ना तय है।

साथ ही तमाम कारोबारियों के लिए भी ये संकट मुश्किल भरा रह सकता है। रूस के ऊपर अमेरिका की तरफ से लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों को देखते हुए भारत से वहां निर्यात करने वाले कारोबारियों की पेमेंट फंसने का डर है। वहीं वहां से भारत में आयात किए जाने वाले सामान की उपलब्धता का भी संकट देखने को मिल सकता है।

भारतीय बाजार भी गिरावट का शिकार

युद्ध जैसे हालात की आशंका से दुनियाभर के शेयर बाजारों की ही तरह भारतीय बाजार भी गिरावट का शिकार हो रहे हैं ऐसे में लोगों को वहां भी नुकसान हो रहा है। कुल मिलाकर अगर ये संकट ज्यादा लंबा खिंचा तो न केवल देश की अर्थव्यवस्था बल्कि लोगों के घर का बजट भी गड़बड़ा सकता है। साथ ही अगर दुनिया के कुछ और देश भी इस युद्ध में शामिल होते हैं तो हालात के संकट का आंकलन नए सिरे से करना होगा।

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