एयरोपोनिक तकनीक से पंत नगर विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों ने उगाईं सब्जियां

पंतनगर
जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विवि के कृषि महाविद्यालय ने विद्यार्थियों में रोजगारपरक क्षमता विकसित करने का अभिनव प्रयास किया तो इसके परिणाम भी सकारात्मक आए। कृषि स्नातक द्वितीय वर्ष के विद्यार्थियों ने हाइड्रोपोनिक और एयरोपोनिक तकनीक से पहली बार पांच प्रकार की पत्तेदार सब्जियों की पौष्टिक फसल तैयार की है। विद्यार्थी कृषि महाविद्यालय के मिनी आडिटोरियम में आज सुबह 10 बजे से इनकी बिक्री भी करेंगे। महाविद्यालय के विद्यार्थियों ने फील्ड में जो सब्जियां उगाईं, उनमें लेटुस, रोमेन, आइसबर्ग, केल, स्विस चार्ड, पोकचोई शामिल हैं। दुनियाभर में इन्हें सलाद के रूप में गर्व से परोसा जाता है। यहां इनका उत्पादन पालीहाउस में बिना मिट्टी किया गया है। पूर्णत: स्वच्छ और कीटनाशक दवाओं से मुक्त इस खेती में उत्पाद अत्यंत स्वादिष्ट होते हैं। खेतों में उगे उत्पादों की तुलना में ये बहुत महंगे भी बिकते हैं। खास बात यह कि इसमें कृषि स्नातक के द्वितीय वर्ष के छात्रों ने एक भी श्रमिक की मदद नहीं ली। विद्यार्थियों ने पहले बीजों को ट्रे में तैयार किया, फिर उन्हें हाइड्रोपोनिक इकाई में रोपित करना सीखा। वहीं रोज पीएच और ईसी मापकर उसे नियंत्रित करने में भी सिद्धता पाई। पौधों का पोषण सीमित मात्रा में पोषक तत्व डालकर किया गया। यह खेती पाइपों में होने से थोड़े क्षेत्रफल में किसी भी ऊंचाई तक ले जाई जा सकती है। इससे प्रति इकाई क्षेत्रफल पैदावार सामान्य से कई गुना बढ़ जाता है, जो आज की बड़ी आवश्यकता है। इन उत्पादों की कीमत बड़े शहरों में छह सौ से आठ सौ रुपये प्रति किलो है, मगर पंतनगर के विद्यार्थी मात्र चार सौ से पांच सौ रुपये प्रति किलो बेचेंगे। पौधों को उनकी जड़ों और उसके नीचे लगे छिद्रदार पाट के साथ ही बेचा जाएगा। ताकि ग्राहक अपने घरों में जरूरत के अनुसार ताजी सब्जी के रूप में उपयोग में ला सकें। फसलों को तैयार करने में उद्यान विज्ञानी डा. वीपी ङ्क्षसह और कीट विज्ञानी डा. जेपी पुर्वार ने डीन कश्यप के साथ कक्षाओं का समन्वयन किया। नाहेप यानी राष्ट्रीय कृषि उच्चतर शिक्षा परियोजना से डा. निखिलेश और डा. प्रतिमा ने प्रत्येक दिन छात्रों को तकनीकी सहयोग दिया। इंडोडच परियोजना के सिद्धांत चड्ढा का भी तकनीकी मार्गदर्शन रहा।

हाइड्रो व एरोपोनिक तकनीक
हाइड्रोपोनिक और एरोपोनिक पद्धति खेती की मृदाविहीन पद्धति है। इसमें पौधों को पानी और पोषण विशिष्ट पद्धति से पाइपों अथवा मिष्ट चेंबर से प्रदान किया जाता है। इसमें पौधों की जड़ों में आवश्यकतानुसार ही समुचित खुराक पहुंचाई जाती है, जिससे पानी और खाद की भारी बचत होती है। पंत विवि के कृषि महाविद्यालय के डीन डा. शिवेंद्र कुमार कश्यप ने बताया कि इस पद्धति में पाइपों का समायोजन किसी भी ऊंचाई तक किया जा सकता है, जिससे वर्टिकल फार्मिंग का नमूना खड़ा होता है, जो कम जगह में अधिक उत्पादन का आधार बनता है। यह पूरी खेती पालीहाउस में नियंत्रित तापमान में होती है, जहां आद्र्रता का संरक्षण होता है। कीट-रोग से भी काफी हद तक बचाव होता है।

 

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