इंडियन इकॉनामिक एसोसिएशन का 104 वां राष्ट्रीय सम्मलेन में CM ने कहा अर्थशास्त्री सीमित दायरे में न चले
भोपाल
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि अर्थशास्त्री सीमित दायरे में न चले। अर्थव्यवस्था की दिशा ऐसी हो कि हम पृथ्वी भी बचा पाए। धरती पर सुखी समाज देखें। वे नरोन्हा प्रशासन अकादमी में इंडियन इकॉनामिक एसोसिएशन के 104 वे राष्टÑीय सम्मलेन को संबोधित कर रहे थे। मुख्यमंत्री ने कहा कि अलग-अलग देशों की अलग-अलग अर्थव्यवस्था थी। भारत ने भी इन देशों की अर्थव्यवस्था को अपनाया लेकिन ये देश अपनी खुद की व्यवस्था में जनता को खुश नहीं कर पाए। साम्यवाद को देशों ने विदा किया, जनता सुखी नहीं हुई। अब सशक्त अर्थव्यवस्था की आवश्यकता है जो आमजन की सभी जरुरतों को पूरा कर सके। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अर्थ व्यवस्था को सशक्त कर आत्मनिर्भरता का मंत्र दिया। उन्होंने कहा कि अर्थशास्त्रियों के सुझाव सरकार के लिए महत्वपूर्ण है इन पर अमल करेंगे।
इंडियन इकॉनामिक एसोसिएशन के104वें वार्षिक सम्मेलन का शुभारंभ। #Bhopal @AIGGPA https://t.co/MEhtERCFg1
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हमारे अर्थशास्त्री सभी के कल्याण का चिंतन करने वाली भारतीय संस्कृति को आधार बनाकर विचार रखें, तो मनुष्य के विकास के साथ ही पर्यावरण का भी संरक्षण हो सकेगा।
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मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि अलग-अलग देशों में अलग अलग अर्थव्यवस्था रही। यूरोप में औद्योगिक क्रांति हुई। मजदूर जो सामान बनाते थे फैक्ट्रियों में कुछ घंटों में बनने लगा। मजदूर शहरों में आए। अस्वास्थ्यकर परिस्थितियों में रहते थे। ज्यादा काम लिया जाता था। कई महामारी फैली वेतन कम दिया जाता था। मजदूरों के शोषण पर कार्लमार्क्स आए। उन्होंने मजदूरों से कहा एक हो जाओं। उनके शब्दों ने मजदूरों के कानों में अमृत घोल दिया। उन्होंने कहा भूमि, पूंजी मशीन पर व्यक्तिगत स्वामित्व शोषण की जड़ है। उत्पादन के साधन समाज में दिए जाए तो शोषण बंद होगा।
इंडियन इकानामिक एसोसिएशन के प्रेसिडेंट प्रोफेसर रमेश चंद्र ने इस मौके पर कहा कि मध्यप्रदेश अब बीमारु नहीं सुचारु राज्य बन चुका है।
सीएम ने कहा कि रुस, चीन में क्रांति हुई दुनिया के एक तिहाई देश कम्युनिस्ट हो गए। लेकिन जनता सुखी नहीं हुई। रोटी हाथ में आई नहीं बोलने की आजादी और चली गई। अमेरिका में एक हाथ में रोटी और दूसरे हाथ में बोलने की स्वतंत्रता थी। उस रास्ते पर भी जो चले वे सुखी नहीं हो पाए। आजादी के बाद हमने दूसरे देशों के रास्ते पर चलने की कोशिश की लेकिन सफल नहीं हो पाए। दुखी होकर कोई जीना नहीं चाहता हम सुखी जीवन चाहते है। भारत ने कहा मनुष्य क्या है। यदि एक सोच हम देखे तो वह मनुष्य शरीर है शरीर सुखी तो व्यक्ति सुखी होगा। शरीर के लिए जितनी आवश्यकताए है वो तो चाहिए। रोटी, कपड़ा मकान, दवाई,पढ़ाई, लिखाई रोजगार का इंतजाम आवश्यक है ये हमको करना ही पड़ेगा।
