केंद्र सरकार से अधीर रंजन चौधरी की मांग, लीगल गारंटी के साथ लागू की जाए एमएसपी

नई दिल्ली
शीतकालीन सत्र के पहले दिन लोकसभा में कृषि कानून वापसी बिल भारी हंगामे के बीच पास हो गया। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने सदन में बिल पेश किया। इससे पहले लोकसभा में कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने सदन में विधेयक पर चर्चा की मांग की थी। उन्होंने केंद्र सरकार से मांग करते हुए कहा कि एमएसपी लीगल गारंटी के साथ लागू की जाए। अधीर रंजन चौधरी ने कहा, 35,000 किसानों को झूठे केसों में फंसाया गया उन्हें मुक्त कराने की मांग और आंदोलन के दौरान मृतक 700 किसानों को मुआवजा देने की मांग पर सदन में चर्चा के लिए मौका दिया जाना चाहिए था, लेकिन हमें सदन में बोलने नहीं दिया गया। संसद का शीतकालीन सत्र सोमवार से शुरू हो गया है और 23 दिसंबर को समाप्त होगा। कांग्रेस ने अपने सांसदों को आज संसद के दोनों सदनों में मौजूद रहने के लिए तीन लाइन का व्हिप भी जारी किया है। भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार के पास 26 नए विधेयकों सहित विधायी कार्य के साथ शीतकालीन सत्र के लिए एक भारी एजेंडा है।

जान गंवाने वाले प्रदर्शनकारियों के लिए अधीर ने की शोक प्रस्ताव की मांग
लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने सदन के अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर विवादास्पद कृषि कानूनों के खिलाफ जारी आंदोलन के दौरान हुई प्रदर्शनकारियों की मौत पर शोक व्यक्त करने के लिए संसद में एक प्रस्ताव लाने का अनुरोध किया था। इसमें उन्होंने लोकसभा स्पीकर को लोकसभा में कार्यवाही के सुचारू संचालन के लिए एक उपाध्यक्ष की नियुक्ति करने के लिए भी लिखा था। इसके अलावा चौधरी ने एक अन्य पत्र में शीतकालीन सत्र के दौरान संसद की कार्यवाही की स्वतंत्र और निष्पक्ष कवरेज सुनिश्चित करने के लिए मीडिया पर लगाए गए प्रतिबंधों को कम करने का भी आग्रह किया था। कांग्रेस नेता ने कहा कि पिछले डेढ़ साल के दौरान महामारी संबंधी दिशा-निर्देशों की आड़ में अधिकतर पत्रकारों को प्रेस गैलरी तक पहुंच और सांसदों के साथ बातचीत से वंचित कर दिया गया है। अधीर ने कहा कि कोरोना प्रतिबंधों को वापस लेने के बाद माल, रेस्टोरेंट्स, सिनेमा हाल, बाजार और सार्वजनिक स्थल खुल गए हैं, लेकिन संसद की कार्यवाही की कवरेज के लिए मीडिया के लोगों पर प्रतिबंध अभी भी जारी हैं। उन्होंने कहा, 'यह संसदीय लोकतंत्र की भावना के विरुद्ध है। मैं इस बात को लेकर चिंतित हूं कि संसद और सांसदों को मीडिया की निगरानी से अलग-थलग करने की एक खतरनाक प्रवृत्ति उभर रही है।'

 

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