वैशाख संक्रांति पर कुचाई शिव मंदिर में अंगारों पर चले श्रद्धालु, 209 साल पुरानी परंपरा ने खींचा ध्यान

 सरायकेला

वैशाख महीने की तपती गर्मी और चिलचिलाती धूप के बीच सरायकेला-खरसावां जिले के कुचाई स्थित प्रसिद्ध शिव मंदिर में शुक्रवार को आस्था, तपस्या और हठभक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिला. वैशाख संक्रांति के अवसर पर सैकड़ों शिवभक्तों ने दहकते अंगारों पर नंगे पांव चलकर अपनी श्रद्धा और भक्ति का परिचय दिया. मंदिर परिसर में सुबह से ही धार्मिक माहौल बना रहा और ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच श्रद्धालु भगवान शिव की आराधना में लीन दिखे.

मन्नत पूरी होने पर अंगारों पर चले श्रद्धालु
वैशाख संक्रांति के मौके पर शिवभक्तों ने गुरुवार से ही उपवास और व्रत रखकर पूजा-अर्चना शुरू कर दी थी. भक्तों ने मंदिर परिसर में भैरवनाथ की विशेष पूजा की और भगवान शिव से मांगी गई मन्नत पूरी होने की खुशी में जलते अंगारों पर चलकर अपनी हठभक्ति का प्रदर्शन किया. भक्तों का मानना है कि शरीर को कष्ट देकर वे अपने आराध्य देव महादेव के प्रति समर्पण और विश्वास व्यक्त करते हैं. अंगारों पर चलते समय श्रद्धालुओं के चेहरे पर न डर दिखाई दिया और न ही दर्द का कोई भाव. ढोल और नगाड़ों की थाप के बीच भक्त पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ आग पर चलते रहे.

महिलाओं ने भी निभाई आस्था की परंपरा
हठभक्ति की इस परंपरा में महिलाओं की भागीदारी भी काफी बड़ी रही. माथे पर जल से भरा कलश लेकर महिलाएं स्थानीय जलाशयों से मंदिर परिसर तक पहुंचीं. इसके बाद उन्होंने सबसे पहले जलते अंगारों पर चलकर अपनी आस्था प्रकट की और फिर मंदिर में भगवान शिव का जलाभिषेक किया. ढोल-नगाड़ों की धुन पर महिलाएं भी पूरे उत्साह के साथ इस धार्मिक अनुष्ठान में शामिल हुईं. बताया गया कि इस वर्ष सौ से अधिक महिलाओं ने अंगारों पर चलकर अपनी मन्नत पूरी होने की खुशी जाहिर की. श्रद्धालुओं का कहना है कि भगवान शिव के प्रति अटूट विश्वास ही उन्हें यह शक्ति प्रदान करता है.

हजारों श्रद्धालुओं ने देखा भक्ति का अनोखा दृश्य
कुचाई शिव मंदिर में आयोजित इस धार्मिक अनुष्ठान को देखने के लिए हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचे थे. मंदिर परिसर और आसपास का इलाका सुबह से ही भक्तिमय माहौल में डूबा रहा. श्रद्धालु पूरे आयोजन के दौरान भगवान भोलेनाथ के जयकारे लगाते रहे. इस अवसर पर पुजारी गोपाल चंद्र तिवारी ने विधिवत पूजा-अर्चना कराई. वहीं गोपी राम सोय, दिनेश महतो, विष्णु महतो, लाल बिहारी महतो, लुदरी हेंब्रम, रेखा दास, विष्णु सोय, गोपी सोय, अक्षय महतो और सामु सोय समेत दर्जनों भोक्ताओं ने आग पर चलकर हठभक्ति की परंपरा निभाई.

209 वर्षों से निभाई जा रही है परंपरा
कुचाई स्थित शिव मंदिर में आग पर चलने की यह परंपरा करीब 209 वर्षों से लगातार निभाई जा रही है. बताया जाता है कि 13 मई 1817 में मंदिर की स्थापना के बाद से हर वर्ष वैशाख संक्रांति के अवसर पर यह धार्मिक आयोजन किया जाता है. स्थानीय श्रद्धालुओं के अनुसार यह केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि भगवान शिव के प्रति अटूट विश्वास और समर्पण का प्रतीक है. पीढ़ी दर पीढ़ी लोग इस अनुष्ठान में शामिल होकर अपनी श्रद्धा व्यक्त करते आ रहे हैं.

शरीर को कष्ट देकर मिलती है आत्मिक शांति
हठभक्ति में शामिल भक्तों का कहना है कि शरीर को कष्ट देकर उन्हें मानसिक और आत्मिक शांति मिलती है. उनका मानना है कि यह पूरी प्रक्रिया भगवान शिव को समर्पित है और उनकी कृपा से ही भक्त बिना किसी नुकसान के आग पर चल पाते हैं. भोक्ताओं के अनुसार वर्षों से इस परंपरा का निर्वहन किया जा रहा है, लेकिन आज तक किसी भक्त को आग पर चलने से कोई गंभीर नुकसान नहीं हुआ. श्रद्धालुओं का कहना है कि न तो किसी को गंभीर जलन की समस्या हुई और न ही किसी को इलाज की जरूरत पड़ी. भक्त इसे भगवान की महिमा और आस्था की शक्ति मानते हैं.

श्रद्धालुओं ने साझा किया अनुभव
श्रद्धालु सुजन सिंह सोय ने बताया कि वैशाख संक्रांति के अवसर पर कुचाई शिव मंदिर में पिछले 209 वर्षों से आग पर चलने की परंपरा निभाई जा रही है. उन्होंने कहा कि हर वर्ष सैकड़ों श्रद्धालु इस धार्मिक अनुष्ठान में भाग लेते हैं और भगवान शिव से सुख-समृद्धि की कामना करते हैं. वहीं भोक्ता दिनेश महतो ने बताया कि वे पिछले 18 वर्षों से इस परंपरा का हिस्सा बन रहे हैं. उन्होंने कहा कि भगवान शिव के प्रति उनकी आस्था ही उन्हें हर वर्ष अंगारों पर चलने की शक्ति देती है. श्रद्धा और विश्वास के साथ किया गया यह अनुष्ठान उनके जीवन में आत्मिक संतोष और शांति प्रदान करता है.

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